संपादकीय

चुनाव 2017: पंजाब की हाईटेक जनता खड़ी कर सकती है त्रिशंकु विधानसभा

July 12, 2016 05:11 PM

आर एल गोयल
पिछले 9 वर्षों से पंजाब की सत्ता पर काबिज शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख रहे व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की गर्जना वक्त के साथ धीमी पड़ने लगी है। हांलाकि सीएम बादल राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं लेकिन इस बार का चुनाव जीतना उनकी पार्टी के लिए उतना आसान नहीं होगा। पूर्व के विधानसभा चुनावों में पंजाब की धरती पर ताल तो कई पार्टियां ठोकती थी लेकिन अब तक बोलबाला दो ही पार्टियों अकालीदल व कांग्रेस का ही रहा है। दिल्ली फतह करने के बाद इस बार आम आदमी पार्टी ‘आप’ भी लंगोट कसे, पट्टों पर हाथ मारती हुई पंजाब के चुनावी दंगल में उतर रही है। इससे अकाली दल व कांग्रेस की मुसीबतें बढ़ रही हैं। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला और पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल का याराना जगजाहिर है तथा चुनावी समर में ये दोनों एक.दूसरे के लिए भरपूर प्रचार करते आए हैं लेकिन इस बार पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला व उनके सुपुत्र अजय चौटाला जेल में हैं। और हरियाणा में उनका राज भी बीते समय की बात हो गई है। पंजाब में अकाली दल की सहयोगी भारतीय जनता पार्टी का जनाधार इन दिनों बढा है। केन्द्र में काबिज होने के उपरांत धीरे -धीरे काफी राज्यों पर भी अपनी पकड़ को मजबूत किया है। हरियाणा में भी प्रकाश सिंह बादल के मित्र ओम प्रकाश चौटाला के स्थान पर भाजपा काबिज है।  

जनता भी अब भोली—भाली न रह कर हाईटेक हो गई जिसके मूड को भांप पाना टेडी खीर है। आशंका इस बात की भी है कि कहीं पूर्व में दिल्ली की तरह सीटों की रेवड़ियां थोड़ी-2 तीनों में बांट कर त्रिशंकू भी खड़ा किया जा सकता है। जो पंजाब की जनता के स्वयं के लिए भी फायदेमंद साबित नहीं होगा।


दूसरी ओर राज्य की जनता का मूड ऊंट को किस करवट बैठाएगा ये तो 2017 के आने वाले चुनावों में पता चला पाएगा लेकिन नशा माफिया, रेत माफिया, भू माफिया आदि-आदि कुछ ज्वलंत मुद्दे जनता के मन को कचोट कर खा रहे हैं। अमुमन जनता बदलाव के मूड में होती है और पिछले चुनावों को छोड़ कर हर बार दो मुख्य खिलाड़ी पार्टियां ही उपर नीचे होती आई हैं। लेकिन इस बार दिल्ली से निकल कर पंजाब में टपकी ‘आप’ इन दोनों मेन पार्टियों का गणित बिगाड़ती नजर आ रही है। जानकारी अनुसार जिस प्रकार आप को प्रतिक्रिया मिल रही है उससे लगता है कि काफी सीटों पर हाथ साफ कर सकती है। हालांकि आप का आधार मालवा में ही अधिक है। जबकि अन्य दो हिस्सों दोआबा व माझा का रूझान अकालीदल व कांग्रेस में अधिक है। पांच दरियाओं की धरती पंजाब तीन हिस्सों मालवा, दोआबा और माझा के रूप में जाना जाता है।
फिलहाल पंजाब की जनता परख-पहचान में लगी है कि चुनावी रूपी वृक्ष का पका आम किस की झोली में डालना है। फिलहाल वर्तमान अकालीदल-भाजपा गठबंधन विकास की दलीलें देकर प्रचार-प्रसार में जुटी है और कांग्रेस व ‘आप’ बड़े -बड़े आश्वासनों के टोकरे हाथ में लिए लोेगों को लुभाने में लगे हैं।

पंजाब कांग्रेस में राहुल की घुड़की के आगे कांग्रेस के सभी गुट एकजुट तो हैं, परंतु टिकटों की बंदरबाट को लेकर कांग्रेसियों में पंजाब कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर की नीतियों को लेकर सुगबुगाहट जारी है, टकसाली कांग्रेसी पंजाब कांग्रेस की टिकट के लिए आवेदन में यह शपथ पत्र कि अगर टिकट नहीं मिला तो वह बागी कांग्रेसी के तौर पर चुनाव नहीं लड़ेगी, को एक शर्त के तौर पर रखे जाने से खफा हैं। इसी बीच कमल नाथ और उसके बाद विवादास्पद कांग्रेस प्रभारी को लेकर विरोधियों को मुद्दा हाईकमान खुद दे रही है। बेशक यह भी एक रणनीति हो सकती है कि पहले विवाद को पैदा करो फिर जनता की हमदर्दी हासिल करने के लिए किसी साफ छवि वाले नेता को कमान संभाल दो।
दलित कार्ड :
तीनों विपक्षी दल दलित कार्ड खेलने के लिए अपने पत्ते खोल रहे हैं। 'आप' के पास दलित नेताओं की कमी खटक रही है जबकि अकाली भाजपा के पास दलित नेताओं की भरमार है। भाजपा ने प्रदेश अध्यक्ष पद तक पंडित कमल शर्मा से से छीन कर केन्द्रीय मंत्री विजय सांपला को सौंप दिया है तो कांग्रेस ने जाट नेता सुनील जाखड़ की जगह चरणजीत सिंह चन्नी, चमकौर साहिब से निर्दलीय विधायक हैं, को विपक्ष का नेता के पद से नवाजा है।
कौन बनेगा मुख्यमंत्री:
सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसे तिकोने संघर्ष में मुख्यमंत्री कौन बनेगा, जाहिर है कि शिरोमणि अकाली दल पुन:बादल को मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करेगा और कांग्रेस के पास कैप्टन अमरिंदर सिंह के अलावा और इस पद के लिए कदावार नेता नहीं है जबकि आप के पास इस पद के लिए कोई नाम सामने नही आ रहा है। आप के सूत्रों की माने तो मुख्यमंत्री पद के लिए उम्मीदवारी का धमाका आप चुनावों से ठीक पहले करेगी।
पहले की तरह जनता भी अब भोली—भाली न रह कर हाईटेक हो गई जिसके मूड को भांप पाना टेडी खीर है। आशंका इस बात की भी है कि कहीं पूर्व में दिल्ली की तरह सीटों की रेवड़ियां थोड़ी-2 तीनों में बांट कर त्रिशंकू भी खड़ा किया जा सकता है। जो पंजाब की जनता के स्वयं के लिए भी फायदेमंद साबित नहीं होगा।

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