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कविताएँ

चक लो लाल गुलाब

February 14, 2017 02:05 PM

चक लो गुलाब लाल, ऐही कम रह गया
पड़दा शर्म वाला, अज्ज अँखां अग्गो लेह गया।
प्यार वाला भूत, सारे जग उत्ते छाया ऐ,
झूठी सारी दुनिया, दस्सो प्यार किन्ने पाया ऐ।
फरवरी महीने जदो, तारीख चौदह आंदी ए,
बागां विचो फूल्ला दी, महक खो जांदी ए।
इकट्ठे कर फुल सारे आशिक लै जांदे ने,
कुड़ियां नू देख गाने, प्यार वाले गांदे ने।
कोई यारो मन गई, गल प्यार नाल करके,
उंगली च छल्ला पावे, मुंड़ा बाह फड़के।
कोई लख वार कहके वी, दिल तोड़ जांदी ऐ,
मेहनत साल भर दी ओह पानी विच पांदी ऐ।
होटलां ते बागा विच, अज्ज बारात यारो सज्जे गी,
मुंड़े नू मिलन कुड़ी, नंगें पैरी भज्जे गी।
गले विच बाहां पाके, इकट्ठे जदो बैन गे,
इक दूजे दी चक सोह, आई. लव. यू कहन गे।
पश्चिमी ए सभ्यता, असी किस सोच पै गये,
साड़ा ए कसूर, जेहड़ा ता ही पीछे रह गये।
सुनो मेरे दोस्तो, ते यारो मेरे बेलियो,
प्यार दा ए खेल कदे, भुल के न खेलियो।
फुल सोहना हर वेले, डाली उत्ते लगदा,
प्यार दा भुलेखा पा के जग सारा ठगदा।
झट पीछे ही टूट जांदा, की फायदा दिल लग्गन दा,
दुनिया ने तमाशा फड़ेयां, इक दूजे नू ठग्गन दा।
लाल फूल्लां नाल यारो, जे प्यार किसे नू मिलदा,
तां घर-घर विच बूटा लाल फूल्लां नाल खिलदा।
गोरे रंग बिंदियां वेख, "रमन" तू न डोल जावी वे,
दाग "झांब" दी इज्जत नू, तू न लगावीं वे।
— रमन झांब, फाजिल्का

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