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कविताएँ

बिखरे परिवेश

July 27, 2017 11:50 AM

रेगिस्तान भी हरे हो जाते हैं
जब साथ अपने खड़े हो जाते हैं
मुंह मोड़ लेते हैं अपने तब
हरे—भरे खेत—खलिहान भी सूख कर बंजर हो जाते हैं।
हो कोई जो भी गिले—शिकवे
वे मिल बैठ कर निपटाए जाते हैं
चंद मेरे लोग तो ऐसे हैं कि
उलाहनों के पिटारे भर-भर के लाते हैं
हालातों के मंजर को कर दरकिनार
सहयोग भी ना देकर
सहानुभूति जताकर इतराते हैं
क्या कहूं अब टूटते परिवेशों में
पलते इन होनहारों के बारे
लाज-हया को दरकिनार कर
न जाने अपनी कौन सी महानता दर्शाते हैं
अब अपने ही अपनों को
दुनियां के सामने नीचा दिखाते हैं
प्रकृति का शाश्वत नियम है
हो मंजर या नजारे कुछ भी
आखिर बदल ही जाते हैं
मृत्यु तो तय हो जाती है
जन्म के साथ ही
बचे जीवन के पल तो
कभी हंसाते कभी रूलाते हैं
तो क्यूं व्यर्थ ही आरोप—प्रत्यारोप के
ढेरों को सजाते हैं।
तुम कुछ करो न करो ये तुम्हारी रज़ा
मेरे हाथ स्वयं ही सहयोग को आतुर हो जाते हैं
रोशन

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