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संपादकीय

कानून की आड़ में अपराध आखिर कब तक?

August 19, 2018 05:07 PM

— रोशन लाल गोयल
अपराध की दुनिया से हर कोई दूरी बनाकर रखना चाहता है। कानून और उसके प्रहरियों का डर जुर्म की राह को रोकने के लिए अहम भूमिका निभाता है। बावजूद इसके जुर्म की प्रतिशतता लगातार बढ़ रही है और कानून का भय अपराधियों के मन में न होकर आम जनता के जहन में बैठ रहा है। कोर्ट-कचहरी के चक्कर, मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना, आर्थिक नुक्सान से हर कोई बच कर रहना चाहता है। लेकिन अपराध और भ्रष्टाचार बे—लगाम फल-फूल रहे हैं। इसका कारण जानना बहुत जरूरी है। इसका सबसे बड़ा कारण जो सामने आ रहा है वह है कानून के रखवालों में से कुछ गद्दारों द्वारा जुर्म करने वालों को शह देना। पद, प्रतिष्ठा पाने तथा तिजोरियां भरने के लिए आड़े आने वाले रोड़े को हटाने के लिए जुर्म करना आम बात हो गई है। कल तक जो पुलिसकर्मी, अधिकारी अपराधियों को पकड़ने के लिए भागदौड़ कर रहे थे। उनको सजा दिलाने के लिए अपने कर्तव्य को पूरा करते थे। आज कहीं न कहीं रिश्वत लेकर या अन्य किसी लालचवश लोगों को अपराध की ओर प्रेरित कर रहे है। जिससे न सिर्फ वर्दी दागदार हो रही है बल्कि निष्ठावान अधिकारियों व कर्मियों को भी ठेस पहुंचती है।  

अपराध जग जाहिर होने पर पैसे के बल पर आपराधिक प्रवृत्ति के दबंग लोग गवाहों को धमकाने, जान से मारने की धमकी देकर या मारकर गवाही से रोक देते हैं।


अगर बात राजनीति की करें तो इस देश में ऐसे सैकड़ों लोग सांसद, विधायक और पार्षद हैं जिन पर हत्या, बलात्कार, अपहरण, तस्करी से लेकर कई जघन्य आरोप हैं लेकिन वो कोर्ट से बाइज्जत बरी होकर मंत्री तक बने। कई अपराधी ऐसे है जो लूटपाट, डकैती, घरेलू हिंसा का जुर्म करने के बाद कई सालों से जेल में बंद है। बात साफ़ ज़ाहिर है कि उनके पास रिहा होने के लिए पर्याप्त धन नहीं है। दुःखद यह है कि जनता की सेवा करने की शपथ लेने वाले जघन्य अपराध करके मंत्री बन बैठते है। काले-जघन्य अपराध करने के बाद ये मंत्री सफ़ेदपोश कपड़े पहनकर जनता की सेवा करने का ढ़ोग करते है। और टैक्स के रूप में आम जनता की गाड़ी कमाई पर मजे लूटते हैं। इससे भी दुःखद यह है कि आम जनता सच जानने के बावजूद भी ऐसे लोगों को ऊंचे पदों पर सुशोभित करती है। अपराध जग जाहिर होने पर पैसे के बल पर आपराधिक प्रवृत्ति के दबंग लोग गवाहों को धमकाने, जान से मारने की धमकी देकर या मारकर गवाही से रोक देते हैं। कोर्ट ऐसी स्थिति में अपराधी को बाइज्त बरी कर देता है। इसका यह अर्थ नहीं कि अपराध हुआ नहीं या वह पाक साफ है। वह पाक साफ नहीं होता, बल्कि कमजोर कानून और कानून की वर्दी में बैठे कुछ भेड़ियों के कारण अपराध करने के बावजूद बच निकलते है। जब देश में कानून के रखवाले अपराध को बढ़ावा दें और जनता की सेवा करने वाले अपराध करके सेवा करने की शपथ लें तो इससे ज्यादा देश का दुर्भाग्य क्या हो सकता है। आपराधिक प्रवृतियों का बढना ये दर्शाता है कि न केवल लोगों में नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है बल्कि समाजिक ढांचा अव्यस्थित हो रहा है।

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