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सकारात्मक सोच के बिना उपभोक्ता अधिकार दिवस मनाना सिर्फ एक ढकोसला

March 18, 2019 01:25 PM

— संजय मिश्रा:

हर साल 15 मार्च को विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस मनाया जाता है। 2019 मे चंडीगढ़ भी मनाया गया जिसमें चंडीगढ़ उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष जस्टिस जसबीर सिंह, चंडीगढ़ कंज़्यूमर प्रोटेक्शन काउंसिल के अध्यक्ष अजय जग्गा, मशहूर कंज़्यूमर एक्टिविस्त एवं अधिवक्ता पंकज चंद्घोटिया, कंज़्यूमर एसोसिएशन चंडीगढ़ के अध्यक्ष आर के कपलस सहित कई विभागीय अधिकारियों ने बढ़चढ़कर भाग लिया।   

सरकार एवं सरकारी अधिकारी कहते है- जागो ग्राहक जागो, जब ग्राहक जाग जाते है और अपनी याचिका लेकर इन अधिकारियों के पास पहुँचते है तो ये अधिकारी आमजन की याचिका को ही खारिज कर देते है।


लेकिन ये आयोजन कितना सही है? क्या उपभोक्ताओं को सचमुच उनके सभी हक जो उपभोक्ता कानून मे लिखे हुए है, वो मिल रहे हैं? मेरी तरफ से तो जवाब है “ना”, क्योंकि सूचित होने का अधिकार एवं इसे दिलाने वाली सेवा सूचनाओं की सप्लाइ, आमजन को नहीं मिल रही है और ये 1986 से आजतक किताबों मे दफन हुई पड़ी है और इसके लिए काफी हद तक उपभोक्ता अधिकार से संबन्धित अधिकारीगण, तथाकथित अधिवक्तागन एवं कई कंज़्यूमर एसोसिएसन के नकारात्मक सोच ज़िम्मेवार है।
ज्ञात हो कि उपभोक्ता अधिकारोे की सूची में एक अधिकार- “सूचित होने का अधिकार” भी है जो कानूनन आमजन को मिला हुआ है, लेकिन ये सूचित होने का अधिकार तो तब पूरा होगा जब सामने वाला सूचित करेगा। अगर सामने वाला सूचित ही नहीं करेगा तो उपभोक्ता सूचित कैसे होगा? विधि निर्माताओं ने इसका भी इलाज करते हुए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 में सेक्शन 2(1)(ओ) मे अन्य सेवाओं जैसे कि बैंकिंग, वित्त, बीमा, परिवहन, बोर्डिंग लॉजिंग, हाउसिंग आदि—आदि सेवाओं के साथ– खबर एवं सूचनाओं की सप्लाइ (Purveying of news or other information) को भी एक सेवा की तरह स्थापित किया।
ध्यान देने वाली बात यह है कि उपरोक्त सभी सेवाएं जैसे बैंकिंग, वित्त, बीमा, परिवहन, बोर्डिंग लॉजिंग, हाउसिंग आदि लेने के लिए संबन्धित कानून मौजूद है जिसके तहत उपभोक्ता सेवा को प्राप्त करते है और अगर कोई कमी हो तो उपचार के लिए उपभोक्ता मंच में आ सकते है। लेकिन सिर्फ खबर एवं सूचनाओं की सप्लाई (Purveying of news or other information) नामक सेवा के लिए कोई कानून नहीं है और ये सेवा अभी तक भी आमजन को नहीं मिल पा रही है और सिर्फ किताबों में दफन हुई पड़ी है। साल 2005 में सूचना अधिकार अधिनियम के आने के बाद एक उम्मीद जागी कि अब ये सेवाएं भी आमजन प्राप्त कर सकेंगे लेकिन उपभोक्ता मंच के अधिकारियों ने इस कानून पर अपना क्षेत्राधिकार नहीं होने की बात करते हुए अंततः इस सेवा को हमेशा हमेशा के लिए किताबों मे दफन कर दिया।
खबर एवं सूचनाओं की सप्लाई (Purveying of news or other information) की सेवा को दफन करने की शुरुआत उपभोक्ता आयोग चंडीगढ़ ने 2012 में की, जब प्रथम अपील संख्या 191/2012 एवं 201/2012 को निस्तारित करते हुए आयोग के अध्यक्ष जस्टिस शाम सुंदर ने 16 जुलाई 2012 को निर्णय दिया और कहा कि– सूचना अधिकार की धारा 22 के मुताबिक इस अधिनियम को ओवरराईड का हक है एवं धारा 23 के मुताबिक किसी कोर्ट में इससे संबन्धित सुनवाई नहीं हो सकती। चूंकि उपभोक्ता मंच एक कोर्ट है इसलिए यहाँ सुनवाई वर्जित है। यही नहीं सूचना अधिकार कानून के तहत सूचना के लिए दी जाने वाली फीस एवं लागत को भी नजरंदाज करते हुए उपभोक्ता आयोग चंडीगढ़ ने कहा कि सूचना अधिकार आवेदक फीस एवं लागत के भुगतान के बावजूद भी उपभोक्ता नहीं है। मामला राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग में पहुंचा जहां पुनरीक्षण याचिका संख्या 3146/2012 को निस्तारित करते हुए 8 जनवरी 2015 को अपने निर्णय मे कहा कि– सूचना अधिकार कानून सूचना सप्लाइ के लिए बनाया गया एक स्पेशल कानून है जिसके तहत अपील एवं शिकायत सुनने के लिए सूचना आयोग बनाया गया है एवं जिसके सेक्शन 23 के तहत कोर्ट को शिकायत सुनने से मना किया गया है। अगर उपभोक्ता मंच को शिकायत सुनने का अधिकार दिया गया तो ये एक ही सेवा (सूचना सप्लाइ) के लिए दो समानान्तर अधिकारी बिठाने जैसा होगा और सूचना आयोग के क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप होगा जो की नीति निर्माता की इच्छा के विरूद्ध है, इसलिए ये कहना जायज होगा कि– सूचना अधिकार आवेदक उपभोक्ता नहीं है और उपभोक्ता मंच इस प्रयोजन के लिए एक कोर्ट है, और शिकायत सुनने से वर्जित है, इसलिए यह पिटीशन खारिज की जाती है।
कमाल की बात ये है कि उपभोक्ता संरक्षण कि बात करने वाले चंडीगढ़ के मशहूर अधिवक्ता (पंकज चंद्घोटिया) ने भी नेशनल कमीशन के उपरोक्त फैसले पर खुशी जताई। दैनिक भास्कर के लोकल अंक ने 17 जनवरी 2015 को प्रकाशित खबर में बताया गया कि पंकज चंद्घोटिया नेशनल कमीशन में इस मामले पर प्रतिपक्ष की तरफ से कई बार उपस्थित हुए और अपना सूचना अधिकार आवेदक को उपभोक्ता नहीं मानने के पक्ष में अपना तर्क रखा, जबकि वास्तव में वो किसी के भी तरफ से कभी भी नेशनल कमीशन में इस मामले में उपस्थित ही नहीं हुए थे।

अब बात करते है उपभोक्ता संरक्षण से जुड़े अधिकारियों के नकारात्मक सोच की:
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के लागू होने से पहले भी हमारे देश मे उपभोक्ता के हितों की रक्षा के लिए कई तरह के कानून थे और उस कानून के तहत अधिकारी भी बनाए गए थे लेकिन वो कानून एवं अधिकारी उपभोक्ता के हितों की रक्षा करने में नाकाफी साबित हो रहे थे जिस कारण 1986 में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम लाया गया जिसके सेक्शन 3 में खासकर लिखा गया कि– इस अधिनियम के उपचार अन्य अधिनियम में वर्णित उपचार के अलावा एक अतिरिक्त उपचार होगा।
1 उपरोक्त धारा को शक्तियों का प्रयोग करते हुए बैंकिंग सेवा से संबन्धित कई शिकायतें उपभोक्ता मंच में सुनी जाने लगी और कभी भी ये नहीं कहा गया कि बैंकिंग के ग्राहकों के लिए बैंकिंग लोकपाल है और यहाँ शिकायत सुनना उनके क्षेत्राधिकार का उल्लंघन होगा। बीमा कि सेवा से संबन्धित कई शिकायतें उपभोक्ता मंच में सुनी जाने लगी और कभी भी ये नहीं कहा गया कि बीमा के ग्राहकों के लिए बीमा लोकपाल है और यहाँ शिकायत सुनना उनके क्षेत्राधिकार का उल्लंघन होगा। यही नहीं इसी सेक्शन 3 को आधार बनाकर हाउसिंग के रजिस्ट्रार, बिजली अधिनियम, रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल जैसे कई अधिकारियों द्वारा सुनी जानी वाली शिकायतों को उपभोक्ता मंच में सुना जाने लगा। लेकिन जब खबर एवं सूचनाओं की सप्लाइ (Purveying of news or other information) की बारी आई तो इन्हे सूचना आयोग के क्षेत्राधिकार मे दखल की याद आ गई
2 जहां तक बात है कि उपभोक्ता मंच एक कोर्ट है या फोरम? तो इसपर ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के शुरुआत में ही साफ साफ लिखा गया है कि– उपभोक्ता के हितों को बेहतर ढंग से संरक्षण एवं उनको त्वरित एवं सस्ता न्याय दिलाने के उद्देश्य से जिला, राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न अधिकारियों की नियुक्ति की गई है। मतलब साफ है कि विधि निर्माता ने उपभोक्ता के हितों को संरक्षित करने के लिए अधिकारी बनाए है ना कि कोर्ट। यही नहीं राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के 5 मेम्बर बेंच ने कलावती के केस में (पुनरीक्षण याचिका संख्या 823-826 ऑफ 2001) 26 सितंबर 2001 को अपने निर्णय में साफ साफ लिखा है कि उपभोक्ता मंच एक अधिकारी है ना कि कोर्ट। 5 मेम्बर बेंच के उपरोक्त फैसले के बावजूद भी 3 मेम्बर बेंच द्वारा जनवरी 2015 में अपने को कोर्ट बताना ये जाहिर करता है कि इनके ऊपर नकारात्मक सोच इस तरह से हावी हो चुकी है कि वो अपने से बड़े बेंच के फैसले के खिलाफ जाने से भी नहीं चूकेंगे।
3 हद तो तब हो गई जब उपभोक्ता संरक्षण के लिए बनाए गए अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के 3 जज बेंच के फैसले को भी दरकिनार करते हुए अपने को कोर्ट घोषित कर खबर एवं सूचनाओं की सप्लाई (Purveying of news or other information) को पूरी तरह से दफन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। विश्वभारती केस में सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय दिनांक 17-01-2003 मे कहा था कि– उपभोक्ता मंच कोर्ट नहीं बल्कि एक “ट्रिब्यूनल” है। ज्ञात हो कि विश्वभारती केस में सुप्रीम कोर्ट के पास याचिका दी गई थी कि– त्रीस्तरीय कंज़्यूमर कोर्ट हमारे देश में पहले से संविधान प्रदत्त त्रीस्तरीय कोर्ट सिस्टम (डिस्ट्रिक्ट कोर्ट, हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट) के समानांतर चल रही है जो असंवैधानिक है इसे अवैधानिक घोषित कर बंद कर दिया जाये। लेकिन उस समय माननीय सुप्रीम कोर्ट के तीन सदस्यीय बेंच ने कंज़्यूमर फोरम को “अन्य अधिकारी” एवं “ट्रिब्यूनल” बताते हुए उपभोक्ता मंच को असंवैधानिक घोषित होने से बचाया था।
4 सरकार एवं सरकारी अधिकारी कहते है- जागो ग्राहक जागो, जब ग्राहक जाग जाते है और अपनी याचिका लेकर इन अधिकारियों के पास पहुँचते है तो ये अधिकारी आमजन की याचिका को ही खारिज कर देते है।
उपरोक्त नकारात्मक निर्णय पर आजतक किसी भी कंज़्यूमर एसोसिएशन ने भी अपनी आपत्ति दर्ज नहीं कराई है, क्योंकि उनको सरकार से ग्रांट लेनी होती है एवं अपनी दुकानदारी चलानी होती है, इसलिए वो सिर्फ दिखावे के लिए साल में कोई एक दो शिविर या सम्मेलन का आयोजन करके अपने कर्तव्यों कि इतिश्री कर लेते है।
उपभोक्ता संरक्षण के काले इतिहास में अपने नकारात्मक फैसले के लिए और सेक्शन 2(1)(ओ) में वर्णित सेवा- खबर एवं सूचनाओं की सप्लाई (Purveying of news or other information) को दफन करने में उपभोक्ता संरक्षण के कई अधिकारीगण याद किए जाएँगे।
सारांश यही है कि जबतक सरकार, सरकारी अधिकारी, उपभोक्ता संरक्षण के लिए बनाए गए अधिकारीगण नकारात्मक विचार के साथ काम करेंगे तबतक उपभोक्ता के हितों का सही मायनों में संरक्षण नहीं हो सकता और ये सभी तरह के सम्मेलन, आयोजन मात्र एक ढकोसला ही साबित होगा और कुछ नहीं। जरूरत है इन अधिकारियों को अपनी नकारात्मक सोच उतारकर सकारात्मक सोच के साथ आगे बढने की, तभी सही मायनों में उपभोक्ता के हितों का संरक्षण हो सकेगा।

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