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ईपीएफओ के कठोर नियमों से अंशधारकों एवं नियोक्ताओं को परेशानी

May 01, 2019 10:46 AM

चंडीगढ, संजय मिश्रा:
यूं तो ईपीएफओ समय के साथ—साथ अपने को बहुत बदल चुका है, कई ऑनलाइन सेवाएँ शुरू होने से कामकाज मे भी सुधार हुआ है और अंदरूनी भ्रष्टाचार पर भी काफी हद तक अंकुश लगा है। पहले जहां पीएफ निकासी मे 4-5 महीने तक लग जाते थे अब एक महीने के भीतर पैसे खाते मे आ जाते है। ईपीएफओ के मुताबिक अगर आपको पीएफ को लेकर कोई भी परेशानी है, तो आप उसकी श‍िकायत ईपीएफओ से ऑनलाइन कर सकते हैं, जी हाँ! इसके लिए ईपीएफओ ने epfigms.gov.in नाम की वेबसाइट शुरू की है जहां आप अपने भव‍िष्य निध‍ि खाते से जुड़ी श‍िकायतों को दर्ज करवा सकते हैं यहां श‍िकायत दर्ज करने के बाद आप उसका स्टेटस भी जान सकते हैं।
बावजूद इसके अभी भी ईपीएफ से आंशधारकों एवं नियोक्ताओं को काफी शिकायतें है जिसके ऊपर भी ध्यान देने की जरूरत है । नियोक्ताओं की सबसे बड़ी शिकायत यह रहती है कि ईपीएफ कार्यालय से उनके पत्राचार पर जवाब नहीं दिया जाता है। ईपीएफ द्वारा जारी हेल्पलाईंन नंबर ठीक से काम नहीं करता या बंद मिलता है, वही आंशधारकों की शिकायत रहती है कि अगर ईपीएफ रिकॉर्ड में मामूली चूक भी है तो भी धक्के खाने पड़ते है, नियोक्ताओं के द्वारा अग्रेषित पत्राचार पर ईपीएफ से जवाब नहीं मिलता है। नतीजा अंशधारक परेशान हो रहे होते है।
चंडीगढ़ के धनास निवासी मूलचंद बताते है कि उनके ईपीएफ रिकॉर्ड मे जन्मतिथि में 5 साल का फर्क है। जब नियोक्ता के माध्यम से आधार कार्ड की कॉपी ईपीएफ कार्यालय को भेजी तो दो महीने तक ईपीएफ कार्यालय से कोई जवाब ही नहीं आया। फिर किसी तरह नियोक्ता को पता लगा कि ईपीएफ के सर्कुलर के मुताबिक जन्मतिथि में एक साल या इससे कम के अंतर के लिए आधार कार्ड मान्य है। अगर जन्मतिथि में 1 साल से ज्यादा का अंतर है तो आधार कार्ड मान्य नहीं है। इसके लिए जन्म प्रमाण पत्र, या 10वीं या 12वीं के बोर्ड का उत्तीर्ण प्रामाण पत्र या फिर पासपोर्ट ही चाहिए। मरता क्या नहीं करता भारत सरकार द्वारा जारी जिस आधार को भारत सरकार के ही मातहत एक विभाग ने रिजेक्ट कर दिया था, मूलचंद ने उसी आधार के बेस पर 2000 रुपए खर्च करके अपना पासपोर्ट बनवाया, और उस पासपोर्ट की कॉपी के बेस पर ईपीएफ कार्यालय ने मूलचंद के जन्मतिथि को सही किया।
चंडीगढ़ के इन्दिरा कॉलोनी निवासी दिलीप कुमार का भी कुछ यही दर्द है। उसके नाम एवं जन्मतिथि मे सुधार के लिए आधार को रिजेक्ट कर दिया गया और जब उसी आधार के बेस पर पासपोर्ट बनाकर उसकी कॉपी ईपीएफ को दी तो ही इसके रिकॉर्ड मे सुधार किया गया।
पता नहीं ये ईपीएफ में ये भ्रष्टाचार की देन है या इसके कठोर नियमों का करतूत, परेशानी तो अंशधारकों को ही होती है क्योंकि उसके पैसे फंसे होते है। वैसे कमाल की बात है जिस आधार को भारत सरकार ने सभी नागरिकों को एक निजी पहचान बताया और सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे अपनी सहमति दी उसी आधार को ईपीएफ कार्यालय नहीं मानता, ऐसा लगता है कि ईपीएफ अंशधारकों के पैसे का मैनेजर नहीं बल्कि मालिक है और वो इसे अंशधारको को भीख के रूप में दे रहा है, ठीक उसी तरह जैसे बैंक आमजन को लोन देने से पहले अनेकानेक फोर्मल्टी पूरी करवाते है।
ईपीएफ को समझना चाहिए कि वो इस फंड के मालिक नहीं बल्कि मैनेजर है और अंशधारकों (फंड के असली मालिक) से एक मैनेजर की तरह ही ब्यवहार करें न कि मालिक की तरह, एवं अंशधारको को होने वाली उपरोक्त तरह की आम परेशानियों को खत्म करने के लिए समुचित कदम उठाए, तभी ईपीएफ में आम कर्मचारियों का विश्वास बढ़ेगा अन्यथा कर्मचारी ईपीएफ से दूरी बनाने की कोशिश करेंगे जो सरकार के सामाजिक सुरक्षा के सिद्धान्त के खिलाफ होगा जिसका ज़िम्मेवार खुद ईपीएफ ही होगा।
ज्ञात हो कि ईपीएफ बॉडी इस फंड को मैनेज करने का शुल्क संबन्धित अंशधारकों के नियोक्ताओं से वसूलते है।

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