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राष्ट्रीय

शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ नौकरी पाना नहीं: राज्यपाल

September 02, 2019 07:26 PM

बरेली, फेस2न्यूज/ओम रतूड़ी: उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री आनन्दी बेन पटेल और परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने महात्मा ज्योतिबा फुले रूहेलखण्ड विश्वविद्यालय, बरेली के सप्तदश दीक्षान्त समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में सहभाग किया।
कुलाधिपति एवं राज्यपाल श्रीमती आनन्दी बेन पटेल, स्वामी चिदानन्द सरस्वती और अन्य विशिष्ट अतिथियों ने पीएचडी की डिग्री और गोल्ड मेडल देकर छात्रों के उज्जवल भविष्य का आशीर्वाद दिया।
विश्वविद्यालय के कुलपति द्वारा स्वामी चिदानन्द सरस्वती , आनन्दी बेन पटेल और अन्य विशिष्ट अतिथियों को स्मृति चिन्ह और अंग वस्त्र भेंट किये। राज्यपाल आनन्दी बेन पटेल ने कहा कि शिक्षा का मतलब सिर्फ नौकरी पाना नहीं बल्कि समाज में फैली कुरीतियों को दूर करना तथा लोगों को शिक्षित करना है। उन्होने कहा कि जब तक हमारे देश की बेटियाँ शिक्षित नहीं होंगी तब तक इस देश का भविष्य उज्जवल नहीं हो सकता। महामहिम ने सभागार में उपस्थित अभिभावकों से कहा कि बच्चों को बाल्यकाल से ही संस्कार सिखायें क्योंकि गर्भावस्था के नौ महीने एवं जन्म के बाद आठ साल तक बच्चे अपने जीवन का 80 प्रतिशत ज्ञान अर्जित कर लेते हैं और बाकी का 20 प्रतिशत पूरे जीवन भर सीखते हैं।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने महात्मा ज्योतिबा फुले रूहेलखण्ड विश्वविद्यालय, बरेली के सप्तदश दीक्षान्त समारोह में विद्यार्थियों को सम्बोधित करते हुये कहा कि ’’दीक्षान्त समारोह बने दक्षिणा समारोह’’ और अब पानी बचाने की; पेड़ लगाने की और एकल उपयोग प्लास्टिक को समाप्त करने की दक्षिणा देने की जरूरत है। अब पर्यावरण एवं जल संरक्षण, प्लास्टिक मुक्त धरा का निर्माण, नदियों की स्वच्छता, वृक्षारोपण ऐसी दक्षिणा देने की जरूरत है। स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि शिक्षा और दीक्षा चले साथ-साथ। आजकल की आधुनिक पद्धति हो या फिर गुरूकुल शिक्षा पद्धति, हम जो भी शिक्षा ग्रहण करे कोई बात नहीं परन्तु शिक्षा के साथ दीक्षा और संस्कारों का समावेश जरूर हो; भारतीय मूल्यों का समावेश हो।
स्वामी चिदानन्द ने कहा कि आज गणेश चतुर्थी भी है इस अवसर पर हमारा संकल्प हो ’स्वच्छ देश प्रसन्न गणेश।’ मुझे लगता है हम जिस भी कल्चर से जिस भी संस्कृति और जिस भी धर्म से आते हो, सभी धर्मो में यह विशेषतायें है हम उससे सीखने की कोशिश करे। उन्होने कहा कि धर्मो की फुलवारी बहुत ही प्यारी है और सबकी खुशबू न्यारी-न्यारी है। धर्मो ने और शिक्षण संस्थाओं ने सभी छात्रोें को सब कुछ समान रूप से दिया है परन्तु छात्र वहीं है जो सीखे। शिष्य का मतलब ही है सीखना, जो सीखता रहे जिंदगी भर।
स्वामी चिदानन्द ने छात्रों से कहा कि जीवन में तीन चीजें बहुत जरूरी है माँ, मातृभाषा और मातृभूमि। भगवान गणेश जी की कहानी सुनाते हुये कहा कि जब उन्हे पृथ्वी की परिक्रमा करने को कहा गया तो उन्होने अपनी माता की परिक्रमा कर यह साबित कर दिया कि माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है, इसलिये भगवान गणेश प्रथम पूज्य है। उन्होने कहा कि जो भी अपने माता-पिता की सेवा करता है और उनका सम्मान करता है उसके साथ सदैव माता-पिता और ईश्वर का आशीर्वाद रहता है।
छात्रों को सम्बोधित करते हुये उन्होंने कहा कि भारतीय जीवन मूल्यों से जुड़े, अपनी जड़ों से जुड़े, अपने पर्व और त्योहार से जुड़े रहे। उन्होने कहा कि आप शिक्षा तो ले अपनी आजीविका के लिये लेकिन दीक्षा लें अपने जीवन के लिये, और वह दीक्षा हो कि मेरा जीवन कैसा बने। जीवन में सत्य, प्रेम, करूणा, अहिंसा जैसे गुणों का समावेश हो साथ ही सब का सम्मान करने का भाव भी आये यही तो है शिक्षा के साथ जीवन में दीक्षा का समावेश होना। साथ ही जीवन में हमेशा सफाई, सच्चाई और ऊंचाई के रास्ते पर चले।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने सभी को गणेश चतुर्थी की शुभकामनायें देते हुये कहा कि धरा को प्रसन्न रखने के लिये गोबर या मिट्टी के गणेश जी बनायें और उसमें एक-एक बीज रखे और चैदह दिनों बाद जब गणेश भगवान का विसर्जन जल में नहीं बल्कि मिट्टी में ही किया जायेंगा। इससे यह होगा की हमने जो बीज गणेश भगवान की मूर्ति में डाला था अब वह पेड़ बन जायेगा वास्तव में यही हमारी साधना का प्रसाद होगा।
कुलपति ने छात्रों को सम्बोधित करते हुये कहा कि शिक्षा वह जो व्यक्ति को समष्टि की ओर ले जाये; शिक्षा वह जो मस्तिष्क की ऊँचाईयों को ही नहीं बल्कि दिल की गहराईयों को भी बढ़ाये और सहनो यशः अर्थात शिक्षा हमारे यश को भी बढ़ाये।
विश्व विद्यालय के कुलपति ने सभी विशिष्ट अतिथियों का अभिनन्दन किया और अंगवस्त्र भेंट किया।
इस अवसर पर आनन्दी बेन पटेल और स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने महात्मा ज्योतिबा फुले रूहेलखण्ड विश्वविद्यालय, बरेली के छात्रों को संकल्प कराया कि पानी का उपयोग कम से कम करे, जल बचायें-जीवन बचायें, दहेज न तो दे और न ले का संकल्प कराया।

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