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राष्ट्रीय

सामुदायिक प्रयास से सूखे की विभीषिका से मुक्त हो खुशहाल हुए लोग

December 05, 2019 10:32 AM

नई दिल्ली, फेस2न्यूज:
यह बात साल 2005 की है। गर्मियां शुरू हो चुकी थीं। अकाल की विभीषिका से जूझ रहे उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड का एक नौजवान 25 अप्रैल को दिल्ली पहुंचता है। वह देशभर से जुटे स्वैच्छिक प्रतिनिधियों की कार्यशाला में हिस्सा लेता है। कार्यशाला में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम सूखे और जल संकट पर चिंता जताते हैं। वह स्वैच्छिक प्रतिनिधियों का आह्वान करते हैं कि वे अपने गांवों को जल ग्राम के रूप में विकसित करें। यह नौजवान कोई और नहीं बांदा जिले के महुआ ब्लाक के जखनी गांव का उमाशंकर पाण्डेय है। आज उसे सारा देश जलयोद्धा के रूप में पहचानता है।
दिल्ली से गांव लौटकर पाण्डेय ने लोगों को कलाम का संदेश सुनाया। इसके बाद सबने जखनी को जलग्राम बनाने का संकल्प लिया। ...और आज जखनी पर भारत सरकार गर्व कर रही है। हाल ही में नीति आयोग ने नई दिल्ली में वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स 2019 जारी किया है। इसमें जखनी के परंपरागत जल संरक्षण को देश के सामने मॉडल माना गया है। केंद्रीय जल शक्तिमंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, नीति आयोग के उपाध्यक्ष डॉ राजीव कुमार, नीति आयोग के मुख्य कार्यपालन अधिकारी अमिताभ कांत, ग्रामीण विकास सचिव डॉक्टर अमरजीत सिन्हा और जल सचिव यूपी सिंह ने खुशी जताई। समारोह में मौजूद जखनी के इस जलयोद्धा का कंधा थपथपाया गया। बड़ी बात यह है कि जखनी के पानीदार लोगों ने जल संरक्षण के इस सामूहिक प्रयास में न तो सरकार से कोई अनुदान लिया और न ही किसी तकनीक का प्रयोग किया। गांव के किसानों और युवाओं ने पुऱखों के फावड़े उठाकर श्रमदान किया। मेड़ बंदी की। गांव का पानी गांव में रोका। अपने गांव को देश का पहला जलग्राम बनाया और नीति आयोग को देश के 1034 जलग्रामों को जन्म देने की प्रेरणा दी।
जखनी गांव की आबादी 2662 है। गांव में कुल 421 किसान हैं। कुल रकबा 2472 बीघा है। इस गांव की बांदा जिला मुख्यालय से दूरी 25 किलोमीटर है। देश-दुनिया के लोग जल संरक्षण के इस अभिनव प्रयोग को जानने-समझने के लिेए जखनी पहुंच रहे हैं। नीति आयोग के जल भूमि विकास सलाहकार अविनाश मिश्रा कहते हैं, देश को जखनी जैसे सामूहिक परंपरागत जल संरक्षण को अपनाने की जरूरत है। मिश्रा सच ही कह रहे हैं। जखनी के तालाबों और कुंओं में तपते मई और जून में भी पर्याप्त जलस्तर होता है। बड़ी दाई तालाब, रद्दू बाबा तालाब, रसिया तालाब, गड़रिया तालाब, नरसिंह तालाब, बड़ा तालाब और जखनिया तालाब इसकी तस्दीक करते हैं। गांव के 33 कुएं भी कभी नहीं सूखते। गांव का भू-जलस्तर कुछ सालों से कभी नीचे नहीं गया। अब यहां के लोग न तो प्यास-प्यास चिल्लाते हैं और नहीं ही यहां की धरती सूखी है।
यहां की जलग्राम समिति मेड़, तालाब, कुआं, नाली आदि के रखरखाव पर बारह महीनों नजर रखती है। समित में उमाशंकर पांडेय, अशोक अवस्थी, निर्भय सिंह, नसीरुद्दीन , दिलेर सिंह, अली मोहम्मद सहित 15 सदस्य हैं। पानीदार जखनी की यह कहानी हैरतअंगेज है। अकाल और सूखे की विभीषिका का सामना कर रहे राज्यों के सामने जखनी गांव के लोगों ने अपने परिश्रम के दम पर 'गंगा' बहाई है। बुंदेलखंड की चर्चा अब तक सूखा, पलायन, भुखमरी, गरीबी, अशिक्षा के लिए होती रही है। केंद्र के सामने विकल्प सुझाए जाते रहे हैं कि पीने का पानी मालगाड़ी से भेजा जाए। ऐसे में बीहड़ और दस्युओं के लिए कुख्यात बांदा जिले के इस गांव के लोगों ने जल संरक्षण के सामूहिक परंपरागत प्रयास से देश के सामने पानी और पलायन रोककर उदाहरण प्रस्तुत किया है। अपने गांव को देश को पहला जलग्राम बनाया और नीति आयोग को देश के 1034 जलग्रामों को जन्म देने की प्रेरणा दी है।
जखनी के इस प्रयोग को जानने-समझने के लिए इजरायल के जल विशेषज्ञ दौरा कर चुके हैं। टीम वर्ल्ड वाटर रिसोर्स ग्रुप 2030 कृषि प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय बांदा, केंद्रीय भूजल बोर्ड उत्तर प्रदेश और जल संसाधन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी यहां के प्रयोग से खुश हैं। सब आश्चर्यचकित इस बात से हैं कि जखनी के लोगों के पास जल संरक्षण करने की कोई डिग्री नहीं है। मगर वह सूखे बुंदेलखंड में जल संरक्षण का तरीका खेत के ऊपर मेड, मेड के ऊपर पेड़ देखकर दांतों तले अंगुली दबाने पर विवश हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में जल संरक्षण की जरूरत पर जोर देते हुए कहा था कि 'खेत का पानी खेत में, गांव का पानी गांव में' हो तो इस संकट से देश को मुक्ति मिल सकती है। जखनी के लोग प्रधानमंत्री की इस सोच के साथ खड़े हुए हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार कहा था, तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा। जखनी के लोगों को वाजपेयी की यह बात चुभ गई। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि परंपरागत प्रयास से जल संरक्षण कर देश को खुशहाल किया जा सकता है। गांधीवादी और जलयोद्धा पाण्डेय कहते हैं, जो कार्य हजारों करोड़ों रुपये खर्च करके नहीं हो सका, उसे जखनी के लोगों ने अपने श्रम से कर दिखाया है। जल संकट का सामना कर रहे राज्यों को सामूहिक समाधान की अवधारणा को अपनाकर खुशहाली लानी होगी।
प्रधानमंत्री ने देश के सरपंचों को लिखे अपने पत्र में मेड़बंदी के माध्यम से जल संरक्षण का संदेश दे चुके हैं। जल शक्ति मंत्रालय के सचिव 6 जुलाई को जखनी पहुंचकर घोषणा कर चुके हैं कि जखनी जल शक्ति मंत्रालय के लिए जलतीर्थ है। जखनी के जल संरक्षण का प्रयोग का पूरे देश में किया जाएगा।
जखनी जल ग्राम के संयोजक उमाशंकर पाण्डेय कहते हैं कि गांव ने दो दशक पहले वह दौर भी देखा है जब युवा पीढ़ी रोजगार के लिए महानगरों में पलायन कर गई थी। अब हालात बदल गए हैं। 165 नौजवान वापस गांव आकर परंपरागत पानी और किसानी के संरक्षण में रोजगार कर रहे हैं। कोई नौजवान खेती कर रहा है। कोई सब्जी उगा रहा है। कोई पशुपालक है। कोई दूध उत्पादक है। कोई मत्स्य पालक है। कोई फल विक्रेता है। यह सब जल संरक्षण का परिणाम है। जखनी के समाधान से यह बात सिद्ध होती है कि तालाब तब भी खरे थे। वह अब भी खरे हैं।
खुशहाल जखनी गांव की यह कहानी यह सिद्ध करती है कि ग्रामीण उठ खड़े हों तो देहातों में रहकर ही वह सब कुछ हासिल कर सकते हैं, जिन्हे पाने के लिए उनको अपनी जड़ों से उजड़ना पड़ता है। देश के सत्तर फीसद लोग गांवों में रहते हैं। जखनी का संघर्ष सामुदायिक प्रयास की मिसाल है। गांवों के पिछड़ा कहे जाने का मिथक जखनी ने तोड़कर विकास और सामुदायिक मेहनत की नई इबारत गढ़ी है। यहां खेतों में धान-गेहूं और सब्जियों की जमकर खेती हो रही है। यहां के हैंड पैंपों में हर समय पानी आ रहा है। गांव में चारो तरफ पेड़-पौधों की हरियाली है। ग्रामीणों के एकजुट प्रयास की वजह से दो सड़कें भी बन चुकी हैं।

 
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