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अफगानिस्तान में 18 साल से तालिबान के साथ लम्बी लड़ाई लड़ रहा अमरीका हार की कगार पर

December 15, 2019 08:57 AM

चंडीगढ, फेस2न्यूज:

मिलिट्री लिटरेचर के पहले दिन का ‘आई.एस.आई, तालिबान और अफगानिस्तान’ विषय पर हुए एक सैशन के दौरान माहिरों ने यह विचार प्रकट करते हुये कहा कि अमरीका 9/11 हमले के बाद आतंकवाद के खि़लाफ़ अपने खि़लाफ़ गतिविधियों को रोकने के मुख्य मकसद के साथ अफगानिस्तान में दाखि़ल हुआ था, जिस में वह कामयाब भी रहा परन्तु तालिबान के विरुद्ध खुली जंग में उसको 18 साल की लम्बी लड़ाई में भी सफलता नहीं मिली। जिस कारण आज भी अफगानिस्तान के लोगों को जंग की इस त्रासदी के ख़त्म होने की कोई आशा की किरण नहीं दिखाई देती। अफगानिस्तान में एक ट्रिलीयन डॉलर के अलग अलग मिलिट्री, सिविल और अन्य अलग-अलग ऑपरेशनों पर ख़र्च करने के बावजूद भी लोगों को शांति और ख़ुशहाली नसीब नहीं हुई।
माहिरों ने कहा कि पाकिस्तान आतंकवाद के खि़लाफ़ लड़ाई में अमरीका के लिए लाभप्रद नहीं रहा जिस कारण अमरीका ने पाकिस्तान की वित्तीय मदद काफ़ी घटा दी है। पाकिस्तान की तरफ से यह पैसा आतंकवाद के खि़लाफ़ लड़ाई की बजाय अपने हथियारों का बेड़ा और मज़बूत करने के लिए किया गया। पाकिस्तान का रूख तालीबान प्रति बदल गया और आई.एस.आई के जरिये पाकिस्तान ने तालिबान की मदद शुरू कर दी।
पैनलिस्टों ने कहा कि पहले की अपेक्षा अब काफ़ी संगठित और ढांचागत हो गई है और अफगान जंग में इसका हाथ ऊपर है। तालिबान के रवैये में भी पहले से काफ़ी बदलाव आया है, उसकी तरफ से लोगों के साथ जुडऩे के लिए अति आधुनिक तकनीकों का सहारा लिया जा रहा है और अपने संदेश लोगों तक पहुँचाने के लिए मीडीए के अलग माध्यमों के द्वारा पहुँच की जा रही है। माहिरों की राय थी कि 1996 और 2001 में शरिया थोपने वाली तालिबान और आज की तालिबान में बहुत फर्क है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि इस्लामिक स्टेट तो सिफऱ् पाकिस्तान के दिमाग़ की उपज है जिसके तालिबान के साथ बहुत बड़े वैचारिक मतभेद हैं।
भारत के हितों को ध्यान में रखते माहिरों ने कहा कि अफगानिस्तान में तालिबान के साथ बातचीत के लिए रास्ता तलाशने चाहिएं क्योंकि अमरीका समेत कई अन्य देशों ने इसकी शुरुआत की है। उन्होंने कहा कि बातचीत के लिए शुरू में प्रत्यक्ष तौर पर रास्ते खोलने चाहिएं और किसी भी समझौते पर पहुँचने के बाद खुली बातचीत शुरू की जानी चाहिए।
पैनल की मैंबर क्रिस्टीन फेयर ने कहा कि राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के नेतृत्व वाली अमरीकी सरकार अब अफगानिस्तान में फ़ौजी कार्यवाही जारी रखने या अमरीकी फ़ौज को वहां तैनात रखने में कोई दिलचस्पी नहीं रखती। अमरीका की अफगानिस्तान के पुन:निर्माण के लिए निवेश करने में कोई रुचि नहीं है। उन्होंने कहा कि अमीरका में मतदान के कारण राष्ट्रपति ट्रम्प जल्द से जल्द अमरीकी फौजियों को वापस बुलाना चाहते हैं।
पूर्व राजदूत श्री विवेक काटजू ने अपने विचार प्रकट करते हुये कहा कि 18 साल की जंग के बावजूद अफगानिस्तान में शान्ति बहाल नहीं हो सकी। अफगानिस्तान का राजनैतिक वर्ग एकजुट न होने के कारण यहाँ राजनैतिक स्थिरता कायम नहीं हो सकी। उन्होंने कहा कि वर्तमान स्थिति यह है कि अफगानितान में तालिबान का दबदबा अधिक है।
मेजर जनरल बी. के शर्मा ने कहा कि 1ट्रिलीयन अमरीकी डॉलर के निवेश के बावजूद अभी भी बहुत से अफगानी गरीबी और भ्रष्टाचार से पीडि़त हैं और साक्षरता और जीवन-दर के मामले में विश्व भर में सबसे निचले देशों में से एक है। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान की आर्थिकता मुख्य तौर पर दान पर निर्भर है परन्तु पिछले कुछ समय पैसे का यह प्रवाह बहुत कम हो गया है।

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