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सेवानिवृत्ति के बाद अच्छी सेटलमेंट की चाहत वाले जजों के कारण भारतीय लोकतंत्र खात्मे की ओर

March 19, 2020 11:56 AM

चंडीगढ, संजय मिश्रा:
सरकार ने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को सेवानिवृत्ति के चार महीने के भीतर ही राज्यसभा के लिए नामित किया है जो भारत में न्यायिक स्वतंत्रता की सुचिंतित प्रवृत्ति पर नए सवाल खड़े करता है।
लाईव लॉ के मनु सेबेस्टियन ने इसे पिछले सभी मामलों से ज्यादा निर्लज्जता की संज्ञा दी है।
ऐसा नहीं है कि सेवानिवृत्त जजों की पुनर नियुक्ति का मामला पहली बार हुआ है। पूर्व सीजेआई न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा को सेवानिवृत्ति के सात साल बाद 1998 में कांग्रेस के टिकट पर उच्च सदन के लिए चुना गया था। जस्टिस बहारुल इस्लाम ने 1983 में कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा का चुनाव लड़ने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज के पद से इस्तीफा दे दिया था और उसी साल वह राज्यसभा सदस्य बन गए ‌थे।
पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ अधिवक्ता अरुण जेटली ने राज्यसभा में नेता विपक्ष के रूप में 2012 में कहा था, एक बार स्पष्ट रूप से कहा था, "जजों के सेवानिवृत्ति पूर्व के फैसले सेवानिवृत्ति के बाद की नौकरी की लालच से प्रभावित रहते हैं।" "मेरा सुझाव है कि जजों की सेवानिवृत्ति के बाद (नियुक्ति से पहले) नई नियुक्‍ति के बीच में दो साल का अंतराल होना चाहिए, अन्यथा सरकार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से न्यायपालिका को प्रभावित कर सकती है। देश में स्वतंत्र, निष्पक्ष और स्वच्छ न्यायपालिका का सपना कभी भी हकीकत नहीं बन पाएगा।"
सीजेआई गोगोई का कार्यकाल एक बार फिर चर्चा में है, क्योंकि इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अपने कृत्यों और अकर्मण्यता से सिर्फ सरकार के हितों की रक्षा की जैसे, सीबीआई-आलोक वर्मा के मामले में लगभग निरर्थक फैसला; राफेल घोटाले में केंद्र को क्लीन चिट देना; चुनावी बॉन्ड योजना को चुनौती देने के मामले की सुनवाई में अनिश्चितकालीन विलंब; कश्मीर बंदियों के मामलों में सरकार से सवाल न करना; ऐसे कई संकेत दिए मानों वह केंद्र सरकार के मुताबिक काम कर रहे हों, जब नागरिकों ने बुनियादी अधिकारों के उल्लंघन की शिकायत की तो सुप्रीम कोर्ट ने उन पर ध्यान नहीं दिया।
सूचना अधिकार कानून को मजबूती नहीं देने के लिहाज से वो केंद्र सरकार के साथ खड़ी दिखी। क्या सूचना अधिकार आवेदक उपभोक्ता है, इस ज्वलंत प्रश्न वाली याचिका को खारिज कर दी और नयाय ना मिलने की शिकायत और उसके बाद शिकायतकर्ता के 12 रिमाइंडर का कोई जवाब ही नहीं दिया।
ख़ुद न्यायमूर्ति गोगोई ने जनवरी 2018 में न्यायाधीशों की प्रेस कॉन्फ्रेंस में चिंता व्यक्त की थी और कहा था कि "पुनर्नियुक्ति का प्रावधान किसी सदस्य की स्वतंत्रता को खत्म कर देगा, वह निश्चित रूप से उन मामलों में फैसले देने से हिचकेगा, जिससे उसकी पुनर्नियुक्ति प्रभावित होगी।"
इस देश की जनता को अभी भी न्यायपालिका में बहुत विश्वास है क्योकि अधिकांश न्यायाधीश ईमानदारी और अखंडता के उच्च मानकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरते हैं, लेकिन कुछ गलत लोग भी हैं जिनसे न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती है क्योंकि वो सेवनिवृत्ति के बाद की नियुक्तियों के लिए सत्ता के मन माफिक फैसले करते हैं।
इन परिस्थितियों में, यह आश्चर्यजनक नहीं लगता कि सीजेआई गोगोई का राज्यसभा के लिए नामांकन एक प्रकार का 'प्रतिदान' है।
जस्टिस गोगोई पर जब सुप्रीम कोर्ट के ही एक महिला कर्मचारी ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। तब उन्होंने खुद पर लगे आरोपों की जांच रुकवाने के लिए अपने कार्यालय की शक्तियों का इस्तेमाल किया था और उस महिला को बहुत ही असम्मानजनक और अन्यायपूर्ण तरीके से नौकरी से हटा दिया गया था यही नहीं महिला के पति और परिवार के सदस्यों के खिलाफ भी आपराधिक मामले दर्ज करने और नौकरियों से निलंबन जैसी प्रतिशोधी कार्रवाइयां हुई ‌थी।
तब न्यायमूर्ति गोगोई के पक्ष में केंद्र के शीर्ष कानून अधिकारियों- अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल- का खड़ा होना न्यायपालिका और कार्यपालिका के आपसी रिश्तों का संकेत देने के लिए पर्याप्त है।
उस महिला के आरोपों की जांच के लिए एक सदस्यीय आयोग का गठन हुआ। इन-हाउस पैनल ने पारदर्शिता के मानदंडों का पालन किए बगैर आरोपों की जांच की और न्यायमूर्ति गोगोई को बरी कर दिया। जस्टिस गोगोई के रिटायरमेंट के बाद यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली उस महिला को सुप्रीम कोर्ट में बहाल कर दिया जिसने न केवल महिला की शिकायत को विश्वसनीयता प्रदान किया, बल्‍कि उसके खिलाफ लगाए गए "बड़े षड्यंत्र" के आरोपों को भी कमजोर किया। न्यायमूर्ति पटनायक आयोग ने पिछले साल सितंबर में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपनी रिपोर्ट दी लेकिन उसे सार्वजनिक नहीं किया गया और ना ही उस पर कोई कार्रवाई की गई।
हालांकि अनुच्छेद 80 (3) के तहत नामांकन के लिए एक शर्त के रूप में 'अच्छे चरित्र' का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।

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