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करोना वायरस उर्फ "अश्वत्थामा" नर नहीं कुंजर

May 18, 2020 11:43 AM

— एफपीएन
बेचारी जनता! और बेचारा द्रोणाचार्य! विशाल साम्राज्य हस्तिनापुर की विशाल सेना का सेनापति, सिर्फ सेनापति ही क्यों, दुश्मन सेना के प्रमुख वीर योद्धाओं का गुरु भी। इकलौते पुत्र अश्वत्थामा का पिता। यानी टैक्स देकर सरकार की तिजोरी भरने वाली जनता, वोट देकर सरकार बनाने वाली और अपनी किस्मत का मालिक बना कर उसे सत्ता सौंप देने वाली जनता।
महाभारत में एक बड़ा रोचक प्रसंग आता है। कौरवों की सेना के पहले सेनापति भीष्म पितामह अर्जुन के बाणों से घायल होकर बाण-शैया पर पड़े हैं। अब कौरव सेना का सेनापति कौरव- पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य को बनाया जाता है। गुरु द्रोणाचार्य महान योद्धा के साथ-साथ कुशल रणनीतिकार भी थे। उनके होते हुए पांडवों को युद्ध जीतना असंभव दिखाई दे रहा था। कृष्ण जानते थे कि गुरु द्रोण की एकमात्र कमजोरी उनका पुत्र अश्वत्थामा है। अब गुरु द्रोण का मनोबल गिराने हेतु रणनीति बनाई गई। गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा उनसे कहीं बहुत दूर युद्ध कर रहे थे। युद्ध में अश्वत्थामा नाम का एक हाथी मारा गया, पांडवों ने गहरी चाल खेली और युद्ध के मैदान में यह बात पूरी तरह से फैला दी गई "अश्वत्थामा मारा गया" "अश्वत्थामा मारा गया" गुरु द्रोण ने जब यह सुना तो उन्होंने इस खबर की पुष्टि करनी चाही। इस उद्देश्य से उन्होंने अपना रथ युधिष्ठिर के निकट लाकर पूछा कि क्या सच में अश्वत्थामा मारा गया? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, हां गुरुदेव, अश्वत्थामा मारा गया, नर नहीं कुंजर। कुंजर यानी हाथी परंतु जितनी देर में युधिष्ठिर ने नर नहीं कुंजर कहा, उतनी देर में कृष्ण ने अपना शंख पूरी जोर से बजा दिया। परिणाम स्वरूप "नर नहीं कुंजर" गुरु द्रोण को सुनाई ही नहीं दिया। क्योंकि गुरु द्रोण युधिस्टर के भी गुरु रहे थे तो कौरव- पांडवों को शिक्षा देते हुए उन्होंने अक्सर देखा था कि युधिस्टर सदैव सच बोलते हैं। इस सब का परिणाम यह हुआ कि गुरु द्रोणाचार्य का मनोबल टूट गया, वे युद्ध से विरक्त हो गए। और मनोबल खो चुका व्यक्ति आज तक कभी कोई युद्ध नहीं जीत सका।    

उन 0.5 फ़ीसदी से भी कम लोगों पर सख्ती करने की बजाय मोदी सरकार ने अपने अमले सहित 99.5 फ़ीसदी लोगों पर इतनी शक्ति दिखाई कि लोग जाने कब तक याद करते रहेंगे। यानी
"लम्हों ने खता की थी,
सदियों ने सजा पाई।"


बस कुछ ऐसा ही देश की बेचारी जनता के साथ हुआ। करोना महामारी के दौरान जब देश के प्रधानमंत्री ने ही करोना को महामारी मानकर देश में लॉक डाउन कर दिया तो भला कोई क्या कर सकता था। जरा सोच कर देखा जाए कि जब चीन सहित अन्य देशों में करोना ने तबाही मचा रखी थी और जनवरी के अंत में केरल में करोना दस्तक दे चुका था तो फरवरी में 'नमस्ते ट्रंप' पर हजारों लोगों का एक जगह एकत्र होना किस तरह के सवाल खड़े करता है। विदेशों से आए लोगों को जिन्हें बाद में ढूंढ—ढूंढ कर एकांतवास किया गया, क्या यह सावधानी पहले रखना जरूरी नहीं था? इससे भी बड़ा सवाल कि क्या 22 या 23 मार्च को देश पर दुश्मन देशों ने मिलकर चारों तरफ से खतरनाक मिसाइलों से आक्रमण कर दिया था जिस कारण यकायक देशभर में लॉक डाउन लगाना जरूरी हो गया था। गणतंत्र देश होने के नाते हालांकि सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से मंत्रणा करना अति आवश्यक था। सवाल यह भी वाजिब है कि क्या सरकार में शामिल किसी भी मंत्री, सलाहकार या अफसर को भी इतना ध्यान नहीं आया कि यह लॉक डाउन थोड़ा सोच-समझकर और तैयारी के साथ लगाया जाना चाहिए। पांच-सात दिन की अग्रिम सूचना पर लोगों को अपने-अपने घर जाने और लॉक डाउन के लिए अपनी कुछ तैयारी करने का समय दे दिया जाए। इस दौरान सरकार भी अपना जमा-घटा- गुणा- विभाजन का हिसाब- किताब लगा लेती। विदेशों से आए लोगों पर कुछ समय के लिए पूरी सख्ती कर दी जाती तो भी यह समस्या देशवासियों के लिए इतनी विकट कतई ना होती। उन 0.5 फ़ीसदी से भी कम लोगों पर सख्ती करने की बजाय मोदी सरकार ने अपने अमले सहित 99.5 फ़ीसदी लोगों पर इतनी शक्ति दिखाई कि लोग जाने कब तक याद करते रहेंगे। यानी
"लम्हों ने खता की थी,
सदियों ने सजा पाई।"
देश की ऊर्जा बर्बाद हुई सो अलग। हालांकि इससे देश में अफसरशाही रूपी ब्रेक की टेस्टिंग जरूर हो गई, जब हजार किलोमीटर प्रति घंटा की स्पीड से भाग रही देश की जिंदगी को अचानक भरभरा कर ब्रेक लगा दी गई।
पंजाब में एक कहावत है कि जब तक पीपे में से आटा खत्म नहीं हो जाता, गेहूं काटने क्यों जाऊं? यानी हर बार समस्या के गहरा जाने के बाद ही उसका समाधान निकाला गया। चाहे वह लोगों तक सब्जी- राशन की पहुंच बनाना हो या संकट में फंसे लोगों को घर तक पहुंचाना। श्रमिक ट्रेनें चलाने को लेकर भी तब तक निर्णय नहीं लिए गए जब तक के लाखों श्रमिक पैदल ही घर जाने को आतुर नहीं हो गए।

 
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