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राष्ट्रीय

हिंदू इतिहास पर वेबिनार का आयोजन, 89 प्रतिभागियों ने रखे विचार

May 20, 2020 09:35 AM

अम्बाला, फेस2न्यूज
हिंदू इतिहास में विकृतियाँ - भाषा, तथ्य और व्याख्याएँ, हिन्दू इतिहास लेखन में जड़ता नामक विषय के अन्तर्गत महर्षि वाल्मीकि अनुसंधान परिषद्, ऐतिहासिक अनुसंधान एवं तुलनात्मक अध्ययन परिषद, पंचकुला, दर्शन योग संस्थान, डलहौजी, संस्कृत विभाग, जीएमएन कॉलेज, अम्बाला छावनी के संयुक्त तत्वावधान में तीन दिवसीय वेबीनार का आयोजन किया गया। वेबिनार की अध्यक्षता महर्षि वाल्मीकि अनुसंधान परिषद् के निदेशक राघव संजीव घारू ने की। राष्ट्रीय वेबीनार के तीन भागों में हुए आयोजन में विभिन्न राज्यों के कुल 89 प्रतिभागियों ने अपने विचारों और टिप्पणियों को सांझा किया।

 घारू ने बताया कि कुछ संगठन आज इतिहास से छेड़छाड़ की आड में स्वत: लिखित इतिहास परोस रहे हैं जो देश की संस्कृति को नष्ट करने का कारण बनता है। राघव संजीव घारू ने अपने अध्यक्षीय भाषण में इस बात को लेकर मुद्दे उठाए कि ऐतिहासिक तथ्यों की गलत प्रस्तुतियों ने युवा पीढ़ी के दिमाग पर कितना बुरा असर डाला है। घारू ने कहा कि शिक्षा संस्थानों में भारत विरोधी इतिहास बच्चों को पिछले 15 साल से पढ़ाया जा रहा हैं । यह एक तरह से भारतीय संस्कृति व सभ्यता पर करारी चोट है। राघव संजीव घारू ने बताया कि अगामी सप्ताह से 7 दिवसीय वैबीनार का आयोजन विभिन्न विषयों पर करने की उनकी योजना है। 

 
संस्कृत विभाग के डॉ आशुतोष अंग्रिश ने हिंदू और उसके इतिहास को परिभाषित करने की समस्याओं पर पीपीटी प्रस्तुति के साथ चर्चा की शुरुआत की। मुख्य वक्ता नीरज अत्री ने 700 एडी से लेकर वर्तमान तक के इतिहास की यात्रा में इस्लाम, बौद्ध, जैन, ईसाई, सिख आदि मतो का हिन्दू धर्म के साथ संबंध या इसके विरोधाभास को केन्द्र बना कर हिन्दू इतिहास के साथ हो रही छेड़छाड़ को प्रमुखता के साथ वास्तविक तथ्यों व आख्यानों की तुलनात्मक समीक्षा वेबीनार के दौरान दी।                वेबीनार के दौरान जिन बिंदुओं पर चर्चा हुई उसमें मुख्यतः मुस्लिम आक्रांताओं ने 'बुतपरस्ती' शब्द बौद्ध धर्म के संदर्भ में ही किया था । ' बुत' शब्द 'बुद्द' से बना है,क्योंकि उस काल में यानी 700 AD के आसपास खलीफा उमर के कहने पर मुस्लिमों ने भारत की ओर रूख किया और उस वक्त यहां बुद्ध की मूर्तियां  बहुतायत में थीं । यही नहीं ये मूर्तीयां तो अफगानिस्तान तक बनाई गई थीं ।
वेबीनार के दौरान तथ्य सामने निकल कर आए कि 7वीं,9वीं तथा 11वीं कक्षा में पढ़ाई जाने वाली एनसीईआरटी द्वारा प्रकाशित किताब जातिवाद, विकृत इतिहास को बढ़ावा दे रही हैं। ये किताबें बच्चों के मन में जातीय जहर घोलने का कार्य कर रही हैं तथा भारत के अक्रांताओं को महिमामंडित किया गया हैं,जिसकी रोकथाम बहुत जरूरी हैं। घारू ने बताया कि कुछ संगठन आज इतिहास से छेड़छाड़ की आड में स्वत: लिखित इतिहास परोस रहे हैं जो देश की संस्कृति को नष्ट करने का कारण बनता हैं इसलिए उनकी ब्रिगेड इस कार्य को कर रही हैं। राघव संजीव घारू ने अपने अध्यक्षीय भाषण में इस बात को लेकर मुद्दे उठाए कि ऐतिहासिक तथ्यों की गलत प्रस्तुतियों ने युवा पीढ़ी के दिमाग पर कितना बुरा असर डाला है। घारू ने सरकार से अपील करते हुए कहा कि शिक्षा संस्थानों में भारत विरोधी इतिहास बच्चों को पिछले 15 साल से पढ़ाया जा रहा हैं।यह एक तरह से भारतीय संस्कृति व सभ्यता पर करारी चोट है। राघव संजीव घारू ने बताया कि अगामी सप्ताह से 7 दिवसीय वैबीनार का आयोजन विभिन्न विषयों पर करने की उनकी योजना है। 

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