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राष्ट्रीय

कोरोना से युद्ध में रणनीति और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव

May 30, 2020 07:41 AM

— एफ पी एन
कोविड-19 के तहत विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बीमार लोगों को ही नहीं बल्कि स्वस्थ लोगों को भी मास्क पहनने के दिशा- निर्देश जारी किए हैं। कुछ सरकारों ने दो कदम आगे बढ़ते हुए मास्क ना पहनने वाले लोगों के चालान काटने और भारी भरकम जुर्माने की व्यवस्था भी कर दी। कोरोना महामारी से लड़ने वाले मेडिकल स्टाफ को पी.पी.ई. किट व दस्ताने पहनने को भी कहा गया है। इधर बार- बार हाथ धोने व सैनिटाइजर इस्तेमाल करने की सलाह भी बड़े स्तर पर दी जा रही है। यह सब काम लोगों ने अपने दम पर ही करना है। हां, मेडिकल स्टाफ को यह सामान सरकार की तरफ से जरूर उपलब्ध करवाया जा रहा है। अब सवाल उठाया जा रहा है कि यदि सब कुछ लोगों को स्वयं ही करना है तो भला कोरोना को हराने का काम लोग कर रहे हैं या सरकारें। देश में बड़े स्तर पर मेडिकल स्टाफ के करोना पॉजिटिव आने के समाचार भी लगातार सुर्खियां बटोर रहे हैं। बात चाहे पीजीआई चंडीगढ़ की हो या दिल्ली के सुव्यवस्थित सरकारी अस्पतालों की। देश के कोने-कोने से ऐसी खबरें निरंतर बिना रुके आ रही हैं। कोरोना से लड़ाई के प्रति इतनी मुस्तैदी दिखाने के बावजूद यदि यह हाल है तो भला हम कहां के योद्धा हुए? युद्ध जीतने का कारगर तरीका जहां दुश्मन की ताकत को पहचान कर उस पर वार करने का होता है, वहां खुद का बचाव करने का तरीका आना और उसको अपनाया जाना अति आवश्यक है। अगर अस्पतालों में मेडिकल स्टाफ को ही करोना वायरस अपनी जकड़ में ले रहा है तो हमें अपने युद्ध नीति पर क्या पुनर्विचार करने की जरूरत नहीं है?
पहले लॉक डाउन, बहुत जगह पर सख्त कर्फ्यू भी, सोशल या शारीरिक दूरी की चेतावनी, कोरोना के मरीजों को घर-घर जाकर पूरे लाव- लश्कर के साथ मेडिकल निगरानी में लाना, बार बार साबुन या सैनिटाइजर से हाथों को वायरस मुक्त रखना, मास्क पहनने की अनिवार्यता, संदिग्ध मरीजों की टेस्टिंग, उनको 14 दिन के एकांतवास में भेजना इत्यादि, इतना सब करने के बाद भी अगर 536 मरीजों की संख्या लॉक डाउन के बावजूद डेढ लाख का आंकड़ा पार कर गई तो हमें सोचना पड़ेगा कि क्या हम सच में युद्ध जीतने की दृढ़ इच्छा शक्ति रखते हैं या दुर्योधन की तरह बस डींगे हांकने के लिए ही हैं।
इस मामले पर किसी ने बहुत सटीक किस्सा सुनाया। इसे जोक भी माना जा सकता है। बस में सफर करते हुए एक सवारी ने कंडक्टर से जाते हुए टिकट ले ली। कंडक्टर जब वापस उधर आया तो उसने फिर से टिकट ले ली। साथ बैठे यात्री से जब न रहा गया तो उसने पूछ ही लिया, भाई आपने दूसरी टिकट क्यों ली? जवाब मिला 'ताकि पहली टिकट के गुम हो जाने पर दूसरी से काम चलाया जा सके'। सहयात्री ने पूछा, परंतु यदि दूसरी भी गुम हो गई तो? नहीं जी, वैसे तो मेरे पास 'बस पास' भी है।
क्या हम सब भी कुछ ऐसा ही तो नहीं कर रहे? आत्मविश्वास की कमी, काम पर ध्यान केंद्रित ना होने और शायद हमारे सुशासन की विफलता का परिणाम ही तो नहीं कि हम पूरी तरह तंदुरुस्त होते हुए भी कोरोना से इस कदर डरे हुए हैं जैसे यह छूत की ऐसी भयंकर बीमारी हो जिसकी जकड़ में आने के बाद हमारा जीना मुमकिन ही ना हो। जबकि भारत में इस बीमारी का वैसा कोई प्रकोप आज तक कहीं भी, किसी भी प्रदेश में देखने को नहीं मिला। सरकारी अमले ने इस मामले में जितनी हाय- तौबा मचाई, जितना हो-हल्ला किया, इतना बड़ा असर अभी तक भारत में तो क्या पूर्वी देशों में कहीं भी कोरोना वायरस दिखा नहीं पाया? हां, सरकारी नीतियों के चलते लोगों की जिंदगी जरूर बद से बदतर होती जा रही है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अभाव में हम ताली- थाली बजाने, मोबाइल की लाइटस से कीट -पतंगों को आकर्षित करने और लड़ाई के दौरान दंभ से ग्रस्त राजा की मानिंद कोरोना योद्धाओं के नाम पर वायु सेना को फूल बरसाने जैसे गैर संवैधानिक कार्य करने में उलझे हुए हैं। इस सब का परिणाम यह है कि हम कोरोना से युद्ध करने की बातें तो जरूर कर रहे हैं परंतु अपनी नालायक रणनीति के चलते करोना से युद्ध करने की बजाय उसमें बस उलझ रहे हैं। जिन देशों ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर अपनी कार्यकुशलता का परिचय दिया उनके सामने कोरोना ने घुटने ही नहीं टेक दिए बल्कि मृत शरीर की भांति शवासन में लेट गया। तबाही तो उसने सिर्फ उन्हीं देशों में मचाई है जहां या तो रणनीति का अभाव रहा या जहां सरकारें अपनी घटिया राजनीति में उलझी रहीं। अपने लोगों के जीवन से जिन्हें कोई बहुत ज्यादा सरोकार ही ना रहा हो। दरअसल हम अपनी बड़ी-बड़ी विफलताओं पर शर्मिंदा होने की बजाय अपनी छोटी-छोटी सफलताओं पर ही संतुष्ट हो रहे हैं। अगर मई की तपती गर्मी में रोजाना 6000 से ऊपर के केस सामने आ रहे हैं तो हमारे कर्णधारों को सोचना होगा कि जुलाई-अगस्त के चोमासे के उस सीलन भरे मौसम में हमारा यह मामूली- सा दुश्मन क्या-क्या गुल खिला सकता है? यदि उस सबका सही-सही अंदाजा लगाकर हमने अपनी रणनीति ना बनाई तो भारत तबाही के मामले में चीन, इटली, अमेरिका, रूस, ब्रिटेन सबको पीछे छोड़ देगा। और फिर विश्व का अगुवा बनने की बातें हमें सिर्फ शेख चिल्ली का तमगा ही दिला पाएंगी।

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