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राष्ट्रीय

कोविड-19, नया सामान्य व्यवहार- सावधानी ही रामबाण है

June 13, 2020 11:44 AM

— डॉ. रवि गुप्ता
लॉकडाऊन तो हटा दिया गया है। इस कदम पर जनता के मिश्रित प्रतिक्रम प्राप्त हुए क्योंकि कुछेक ने तो राहत की भावना से इसका स्वागत किया है, जबकि अन्यों ने अनलॉक—1 के परिणामस्वरूप देश में कोविड-19 के मामलों की संख्या में अत्यधिक बढ़ोतरी के खतरे की आशंका प्रकट की है।
लॉकडाऊन के दौरान, हमने हाथों की बार-बार सफ़ाई रखने, सार्वजनिक स्थानों पर सामाजिक/व्यक्तिगत दूरी, नाक व मुंह को मास्क से ढंक कर रखने, सामाजिक एकत्रता करने से बचने इत्यादि सहित रोग फैलने से रोकथाम की आदतों का अभ्यास करना सीखा। लॉकडाऊन के चलते रोकथाम वाली इन सभी आदतों से कोरोना-वायरस के रोगियों के बढ़ने की गति में कमी आई तथा इसी दौरान हमें रोग से निपटने हेतु अपने ‘मानक संचालन प्रक्रियाएं’ (एसओपीज़) विकसित करने का समय मिला तथा इसके साथ ही हमें वर्तमान रोगियों की सही ढंग से देखभाल हेतु स्वास्थ्य से संबंधित आधारभूत संरचना विकसित करने का समय प्राप्त हुआ।
परन्तु वास्तविक अग्नि-परीक्षा तो अब लॉकडाऊन हटाने के बाद प्रारंभ हुई है। हम अपनी सुरक्षा को कम नहीं कर सकते तथा न ही इस चरण में आकर हम वर्तमान स्थिति को हल्के में ले सकते हैं क्योंकि अब कोविड-19 के नए रोगियों की संख्या तीव्रता से बढ़ती जा रही है। हम चाहे यह भी मान कर चलें कि प्रत्येक नए रोगी से केवल एक ही रोगी संक्रमित होगा, फिर भी नए रोगियों की संख्या बहुत तीव्रता से दोगुनी होना प्रारंभ हो सकती है। यदि रोकथाम न की गई, तो हमारे देश की जितनी जनसंख्या है (स्मरण रखें कि अब हम लगभग 135 करोड़ लोग हैं तथा अमेरिका की जनसंख्या 35 करोड़ है), उसके हिसाब से नए रोगियों की संख्या में निरंतर होती जा रही बढ़ोतरी शीघ्रतया अस्पतालों के बिस्तरों की संख्या व उस आधारभूत संरचना को पीछे छोड़ जाएगी, जिसे हम लॉकडाऊन की अवधि के दौरान विकसित करने योग्य हुए हैं।
हमें एक अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य अवश्य ही स्मरण रखना होगा कि यह वायरस केवल सामने से दिखलाई देते लक्षणों वाले रोगियों द्वारा ही नहीं फैलता, अपितु बिना किसी लक्षणों वाले ऐसे व्यक्तियों द्वारा भी फैलता है, जिनके शरीर में वायरस विद्यमान होता है- वे बड़ी चिंता का विषय हैं क्योंकि वे देखने में तो स्वस्थ दिखते हैं परन्तु वे प्रायः रोकथाम की सावधानियों का ख़्याल नहीं रखते। यहां तक कि डॉक्टर भी ऐसे बिना लक्षणों वाले व्यक्तियों को असुरक्षित ढंग से प्रायः यही सोच कर मिलते हैं कि यह तो स्वच्छ व सुरक्षित लोग हैं; जबकि यह वायरस उनके द्वारा फैल रहा है।
इस प्रकार, अब यह महत्त्वपूर्ण है कि हम सभी यही मान कर चलें कि हमारे आस-पास सभी लोग वायरस लेकर घूम रहे हैं, चाहे उन में रोग का कोई लक्षण दिखलाई देता है या नहीं; इस लिए सार्वजनिक स्थानों पर मास्क पहनने, सामाजिक-दूरी बनाए रखने, बार-बार हाथों धोनें, सामाजिक एकत्रताओं से बचने के नियमों का पूरी सख़्ती से पालन करने की आवश्यकता है। वास्तव में, अनलॉक—1 में सतर्कता का हमारा स्तर अत्यधिक ऊँचा रखने की आवश्यकता है क्योंकि लॉकडाऊन की अवधि के मुकाबले अब लोग आपस में एक-दूसरे से अधिक मिलने लगे हैं।
समाज में इस समय लॉकडाऊन व अनलॉकिंग के आदर्श समय संबंधी समाज में बहुत बड़ी बहस चल रही है। कुछ लोगों का तर्क है कि इस चरण में जब अधिकतर विकसित देशों ने लॉकडाऊन लागू किया है, हम तब लॉकडाऊन को हटा रहे हैं। आईए हम सभी घटनाओं की क्रमशः समीक्षा करें।
इस वर्ष 30 जनवरी को भारत में कोविड-19 की छूत से प्रभावित पहला केस सामने आने से लेकर 11 मार्च, 2020 को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) द्वारा कोरोना-वायरस को विश्व स्तरीय महामारी घोषित किए जाने तक भारत सरकार ने इस बड़े जन-स्वास्थ्य विनाश का सामना करने हेतु कई कदम उठाए।
‘जनता कर्फ्यू’ के नाम से प्रथम कर्फ्यू हमारे प्रधान मंत्री द्वारा 22 मार्च, 2020 को राष्ट्र को अपने संबोधन में घोषित किया गया था, जब भारत में केवल 340 केस थे। इस एक-दिवसीय जनता कर्फ्यू ने 31 मई तक बहुत चुस्ती से राष्ट्र स्तरीय कर्फ्यू/लॉकडाऊन के क्रम में परिवर्तित कर दिया गया, जिसने हमें अपने देश में स्वास्थ्य आधारभूत संरचना में बढ़ोतरी करने का समय दिया; जैसे कि मन्द, मध्यम व गंभीर लक्षणों वाले रोगियों के तीन वर्गों हेतु अस्पतालों में उचित संख्या में बिस्तरों की व्यवस्था की गई; निदान हेतु ‘मानक संचालन प्रक्रियाएं’ (एसओपीज़) विकसित की गईं; रोग-निरोधकों व उपचार के साथ पर्सनल प्रोटैक्शन इक्विपमैंट्स (पीपीईज़) के उत्पादन में बढ़ोतरी की गई। इन सक्रिय कदमों से देश में आतंक फैलने की स्थिति से बचे रहने में सहायता मिली क्योंकि अमेरिका व यूरोप सहित बहुत सारे विकासशील देशों में ऐसा कुछ होता देखा गया। उदाहरणतया, हमारे देश में स्वास्थ्य कर्मचारियों हेतु पीपीईज़ व रोगियों के लिए अस्पतालों की कमी पर कोई हंगामा नहीं हुआ। ऐसा मुख्यतः इस लिए हुआ क्योंकि हम ने लॉकडाऊन तब प्रारंभ किया, जब ऐसी आधारभूत संरचना की आवश्यकता कम थी क्योंकि कोरोना-वायरस के मामलों की संख्या बहुत कम थी, जिसके कारण तैयारी हेतु प्रयाप्त समय मिल गया। लॉकडाऊन के समय में सरकार ने अपने संचार संसाधानों द्वारा देश की विशाल व विभिन्नता भरपूर जनसंख्या को सफ़लतापूर्वक इस संबंधी जानकारी देकर शिक्षित कर दिया था कि इस महामारी को रोकने के लिए रोकथाम रखने की आदतों का अभ्यास आवश्यक है।
इतनी अधिक विभिन्नता-भरपूर विशाल जनसंख्या के व्यवहार में इतने अल्प समय के भीतर बडा़ परिवर्तन लाना कोई आसान काम नहीं है। जैसे कि हमें ज्ञात है कि भारत में कई प्रकार के शैक्षणिक, सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक कारणों से कानून को क्रियान्वित करना एक कठिन कार्य है परन्तु समय से पूर्व लॉकडाऊन का लाभ हुआ तथा हमारे मीडिया ने अत्यधिक सक्रिय भूमिका निभाई तथा लगभग दो माह के लॉकडाऊन के समय में हमारी जनता के मनों में रोकथाम के सभी उपाय अच्छी प्रकार से बिठाने में सहायता की; हम आम लोगों में जागरूकता का एक स्तर सृजित करने में सफ़ल रहे।
हमारे देश का एक अन्य अच्छा बिन्दु यह भी रहा कि चाहे खाद्य वस्तुओं व अन्य आम वस्तुओं सहित दिनचर्या के उपयोग वाली आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन लॉकडाऊन की अवधि के दौरान बन्द हो गया था, इसके बावजूद देश आगे बढ़ता रहा तथा किसी स्थान से काला-बाज़ारी अथवा लोगों में किसी प्रकार के आतंक फैलने का कोई बड़ा समाचार नहीं मिला। दिनचर्या में उपयोग वाली ऐसी वस्तुओं की कमी से बचने हेतु सरकार ने बहुत चुस्ती से चरणबद्ध ढंग से ऐसे उत्पाद तैयार करने वाली औद्योगिक इकाईयां खोल दीं, ताकि आवश्यक वस्तुओं की कोई कमी न हो।
9 जून, 2020 तक कोरोना-वायरस से संक्रमित होने वाले रोगियों की कुल संख्या 2,67,749 हो गई थी तथा इनमें से 1,30,000 रोगी इस समय अस्पतालों में उपचाराधीन हैं तथा इतने ही व्यक्ति इस रोग से ठीक हो चुके हैं। कोरोना-रोगियों की मृत्यु दर लगभग दो से तीन प्रतिशत के मध्य है तथा स्वस्थ होने की दर लगभग 50 प्रतिशत है, जो इस तथ्य का प्रमाण है कि हमारे स्वास्थ्य प्रशासकों/स्वास्थ्य कर्मियों का सामर्थ्य व हमारी आधारभूत संरचना का स्तर विश्व के किसी अन्य देश से कम नहीं है तथा हम किसी भी स्थिति का सामना करने हेतु पूरी तरह डटे हुए हैं।
परन्तु हमें इस तथ्य को भी जान लेना चाहिए कि अभी इस रोग का अन्त होता कहीं दिखलाई नहीं देता। इस वायरस के किसी प्रभावशाली दवा से उपचार या वैक्सीन की अनपस्थिति के कारण देश में इस रोग का फैलना रोकने हेतु अनलॉक का वर्तमान समय अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है, ताकि हम कहीं ऐसी परिस्थति में न पहुंच जाएं, जहां लक्षणों वाले केस हमारे देश की उपलब्ध चिकित्सीय संरचना की अपेक्षा में बढ़ जाएं। अपितु हमें रोकथाम के उपायों का पूर्णतया ख़्याल रखने की आवश्यकता है, ताकि हम सभी इस वायरस के और पासार के क्रम को एकजुटता से सफ़लतापूर्वक तोड़ सकें।
यह वायरस क्योंकि जीवित शरीर से बाहर कुछ दिनों से अधिक जीवत नहीं रह सकता तथा एक मानव शरीर के भीतर यह लगभग 4 सप्ताह जीवित रहता है, यदि हम मिल कर इस वायरस के फैलने का क्रम तोड़ें, प्रत्येक समय तथा प्रत्येक स्थान पर (3 ईज़ – 3 Es) हर प्रकार की सावधानियां रखी जाएं, तो हमारा देश 5-6 सप्ताह में ही इस वायरस से मुक्त हो सकता है। हाल ही में न्यू ज़ीलैण्ड ने इस वायरस के फैलने का क्रम तोड़ कर देश को पूर्णतया वायरस से मुक्त बनाने की मिसाल कायम की है।
अतः आईए हम सभी यह संकल्प लें कि हम अब किसी लक्षणों वाले/बिना लक्षणों वाले मामलों से वायरस के फैलने के कारण कोई नया केस पैदा न होने दें तथा हम अपनी तरफ़ से रोकथाम हेतु सीखें सभी सख़्त कदमों का अनुपालन करें तथा सावधानी से ‘3 ईज़’ - ऐवरीबॉडी (प्रत्येक व्यक्ति), ऐवरी टाईम (हर समय) तथा ऐवरीव्हेअर (प्रत्येक स्थान) को क्रियान्वित करें।
(चिकित्सा अधीक्षक, गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, चंडीगढ़)

 
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