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चंडीगढ़

क्यों बढ़ता गया मर्ज

July 03, 2020 01:01 PM

— एफ पी एन

"मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की" बहुत पुरानी कहावत है। आज इसी तर्ज पर पूरे देश में करोना के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। कर्फ्यू और लॉकडाउन के बावजूद 3 अंकों वाली संख्या 5 अंकों तक पहुंच गई है। प्रशासन आए दिन आम लोगों पर सख्ती करने के नए से नए आदेश जारी कर रहा है। अधिकारी अपनी नीतियों और अपनी समझ को दोष देने की बजाय सारा ठीकरा जनता के सर पर फोड़ देने पर आमादा हैं। आम आदमी क्या करें? आम आदमी की हालत आज कुछ ऐसी है।
"कत्ल हुआ हमारा
इस तरह किस्तों में।
कभी खंजर बदल गए,
कभी कातिल बदल गए।"
आखिर कितना पिसे? लॉकडाउन लगा तो काम धंधा बंद! कर्फ्यू लगाकर घर से निकलना दूभर। जरूरी सामान के लिए आम जनजीवन में मारामारी पड़ी तो अधिकारियों को होश आया कि लोगों की रोजमर्रा की जरूरतें भी पूरी होना उतना ही आवश्यक है जितना करोना से बचना। बाजार खुले तो जैसे प्यासे को पानी मिल गया हो। लोगों को रोजी-रोटी की चिंता थी तो अधिकारियों को अपनी नीतियां फेल होने की चिंता। लोगों ने मास्क नहीं पहने, 2 गज की दूरी बरकरार नहीं रखी तो चालान का प्रावधान कर दिया गया। यानी आम के आम गुठलियों के दाम! आम आदमी पर नकेल पूरी तरह कसी होने के बावजूद करोना मरीजों की संख्या दिन दुगनी- रात चौगुनी होती रही। जरूरत से ज्यादा इंतजाम करने के दावे करने वाले अधिकारी मरीजों के लिए सही व्यवस्था तक नहीं कर पाए। कहीं साफ पानी उपलब्ध नहीं तो कहीं सफाई ना होने की शिकायत। बदन झुलसा देने वाली गर्मी में ए.सी. का इंतजाम तो बहुत दूर की बात, कूलर तक की उचित व्यवस्था नहीं हो पाई। एकांतवास के लिए भेजे गए मरीज पहले अपने स्तर पर संबंधित अधिकारियों की मिन्नतें करते रहे कि यदि उनसे व्यवस्था नहीं हो पा रही तो उन्हें होम क्वारंटाइन होने की इजाजत दे दी जाए। लेकिन वार रूम के अधिकारी ए.सी. कमरों में बैठकर भला आम आदमी की दयनीय दशा को कैसे समझ पाते? सो कुछ मरीजों द्वारा बात मीडिया तक पहुंच गई। क्रोना पीड़ित मरीजों के लिए अब और नई मुसीबत! मीडिया तक आखिर बात क्यों पहुंचाई गई? इस बात से चिड़े अधिकारी मरीजों को दूसरी तरह से परेशान करने की ठान बैठे। मसलन एक जगह से दूसरी जगह भेज दो, फिर बिना बताए कहीं और भेज दो। मरीजों की रिपोर्ट अपने पास रखे रखो। मरीज ने रिपोर्ट मांगी तो अपनी कुर्सी और अपने रुतबे का रोआब झाड़ दो।
ताजा किस्सा रमेश सिंगला का सामने आया। चंडीगढ़ के सेक्टर 16 की प्राइम लोकेशन में केमिस्ट शॉप के मालिक, उनके बेटे, चार सेल्समैन, पिता व पत्नी को करोना के लक्षण दिखाई दिए तो वे करोना टेस्ट करवाने पहुंचे। टेस्ट पॉजिटिव पाए गए। 3 दिन पीजीआई में इलाज के बाद धन्वंतरि आयुर्वेदिक कॉलेज एवं अस्पताल में क्वारंटाइन हेतु भेज दिया गया। यहां की व्यवस्था देख कर वे हतप्रभ रह गए। बकौल रमेश सिंगला चंडीगढ़ में रहते हुए मुझे 36 साल हो गए हैं। मैं तो सपने में भी नहीं सोच सकता कि करोना जैसी बीमारी के मरीजों को ठीक होने के बाद ऐसी जगह पर रखा जा सकता है। ए.सी. तो क्या होना था, यहां कूलर भी ठीक तरह से नहीं चल रहे थे। धनवंतरी के डायरेक्टर का रवैया इतना रूखा था कि 2 दिन भी उस नर्क में रहना मुश्किल लगने लगा। हमारे घर पर उससे 100 गुना ज्यादा अच्छी व सेहतमंद व्यवस्था पहले से थी। मैं बार-बार अधिकारियों को होम क्वॉरेंटाइन करने की रिक्वेस्ट करता रहा। कई जगह से सिफारिश भी करवाई। परंतु अधिकारी अपना अड़ियल रवैया छोड़ने को तैयार ही नहीं हुए। लगभग 27 घंटे वहां रहने के दौरान ना तो मेरा एक बार भी टेंपरेचर चेक किया गया और न हार्ट पेशेंट होने के बावजूद एक बार भी बी.पी.चेक करने की जहमत उठाई गई। रमेश के अनुसार बाथरूम इतना गंदा था कि मैं एक बार भी वहां जाने का हौसला नहीं कर पाया। पूरा टाइम वहां एक ही नर्स मौजूद रही। खाना इत्यादि देने का काम भी वही करती रही। सीनियर सिटीजन रमेश की एक और बड़ी मुश्किल कि डॉक्टर उनको नेगेटिव घोषित तो कर रहे थे परंतु बार-बार मांगने पर भी उनको रिपोर्ट नहीं दिखा रहे थे, पीजीआई से हुए इलाज का ब्यौरा भी धनवंतरी के स्टाफ ने अपने कब्जे में कर रखा था। केमिस्ट शॉप करते हुए लगभग 36 साल हो गए। अच्छे से अच्छे डॉक्टर मित्र भी हैं। किसी डॉक्टर से कोई सलाह भी लेनी हो तो वह रिपोर्ट भेजने को कहते। लेकिन अधिकारी रिपोर्ट देने में व्यर्थ की आनाकानी करते रहे। ठीक हो कर घर पहुंचे आज 20 दिन हो गए, किंतु अपनी रिपोर्ट के लिए अभी भी मारा मारा फिर रहा हूं। कभी नोडल अफसर को मिल लेने को बोला जाता है तो कभी डायरेक्टर हेल्थ को। सेक्टर 16 अस्पताल में रुटीन चेकअप के लिए भी जाता हूं तो वो पुराना ब्योरा मांगते हैं, अधिकारी हैं कि कोई बात सुनने या समझने को तैयार ही नहीं।

 
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