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पंजाब

खजाने में सेंधमारी- फिर भी तरफदारी

July 06, 2020 04:21 PM

— एफ पी एन

सरकारी खजाना यानी सरकार का धन। सरकार के पास यह धन कहां से आया? लोगों द्वारा दिए गए विभिन्न प्रकार के टैक्सों से। लोकतंत्र में सरकार किसकी है? लोगों की। विधान पालिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका का कार्यभार संभालने वाले लोगों को इसीलिए जनसेवक कहा जाता है। जनसेवक यानी जनता के सेवक। प्रधानमंत्री खुद को बार-बार चौकीदार यूं ही नहीं कहते। प्रधानमंत्री तो क्या सभी मंत्री, मुख्यमंत्री, अफसर, जज, और उनके अधीन काम करने वाले सभी कर्मचारी लोगों के धन की रखवाली करने हेतु रखे गए चौकीदार ही तो हैं। उन सब को वेतन भी इसी काम का मिलता है ताकि लोग अपने घरों में निश्चिंत होकर रह सके और बेखौफ होकर अपना कारोबार कर सकें। लेकिन अगर लोगों के धन का दुरुपयोग हो रहा हो या कोई कर्मचारी या अधिकारी अपने कर्तव्य का सही से पालन ना कर रहा हो तो लोग उस बारे में सूचना प्राप्त करने के अधिकारी है। संविधान में इस को 'सूचना का अधिकार' कहा गया है किंतु शिक्षा विभाग पंजाब में बड़ा दिलचस्प वाकया हुआ।
गवर्नमेंट टीचर यूनियन पंजाब के सचिव हरनेक सिंह मावी ने शिक्षा विभाग में एक क्लर्क द्वारा किए जा रहे गबन का पर्दाफाश होने के बाद मामले की ताजा जानकारी लेने हेतु 'सूचना का अधिकार' के तहत एक आरटीआई निदेशक शिक्षा विभाग को भेजी। दरअसल क्लर्क पर कई माह तक वेतन बिलों में जरूरत से ज्यादा राशि खजाने से निकलवा कर अपनी पत्नी व कुछ अन्य लोगों के खाते में जमा करवाने के आरोप थे। मामला सामने आने के बाद उस पर 12-6- 2010 को भारतीय दंड संहिता की धारा 409 व 420 के तहत मोहाली जिले के कुराली थाने में केस दर्ज किया गया था।
ब्लॉक शिक्षा अधिकारी कुराली हरभजन कौर द्वारा पत्र नंबर 170, 171,172 तिथि 11-11- 2009 को मोहाली के जिला शिक्षा अधिकारी को क्लर्क द्वारा किए गए गबन की सूचना देते हुए उसके खिलाफ कार्रवाई करने की अपील की गई थी। टीचर यूनियन के नेताओं द्वारा भी बार-बार पत्राचार करने के बाद ही यह केस दर्ज किया गया था। क्योंकि आरोपी को कई अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त था अतः केस चींटी की चाल भी नहीं चल रहा था। गवर्नमेंट टीचर यूनियन के तत्कालीन प्रेस सचिव हरनेक सिंह मावी द्वारा भेजी गई आरटीआई को डी. पी. आई. कार्यालय के सुपरिटेंडेंट अमला ने 7-6-2016 को पत्र नंबर 4493-94 के द्वारा आरोपी से पूछा कि आप को निलंबित किए जाने संबंधी आर्डर, नोटिंग व पत्राचार की कॉपी यूनियन लीडर को मुहैया करवा दी जाए या नहीं? और मजेदार बात यह कि उसी सुपरिटेंडेंट ने दो माह बाद पत्र नंबर 6504 दिनांक 08-08-2016 को यह कहते हुए वांछित सूचना देने से इंकार कर दिया कि गबन के दोषी क्लर्क हरिंदर सिंह ने कहा है कि मेरे संबंधी किसी भी तरह की कोई सूचना किसी को ना दी जाए। यानी शिक्षा विभाग पंजाब में चोर और बेईमान व्यक्ति के सभी अधिकार सुरक्षित हैं। गोया वह भ्रष्ट क्लर्क ना होकर कोई प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति हो जिसकी निजी जानकारी देने में देश की सुरक्षा को नुकसान हो सकता हो। गौरतलब है कि टीचर यूनियन के महासचिव सुच्चा सिंह खटड़ा की इस गबन संबंधी 06-06-2006 को की गई शिकायत पर 24-09-2007 को कार्रवाई की गई थी लेकिन जब महासचिव ने अध्यापकों की पासबुक व दफ्तर की कैशबुक का मिलान करने की मांग रखी तो 09-11-2007 को दिवाली की रात को दोषी व्यक्तियों द्वारा संबंधित रिकार्ड नष्ट करने की नियत से दफ्तर में आग लगा दी गई थी। काफी रिकॉर्ड जल गया था लेकिन जो थोड़ा बच गया उस के मुताबिक भी उस क्लर्क ने 3,91,002 रुपए का गबन किया था लेकिन दिन - रात गहरी नींद में सोए रहने वाले विभाग ने एफ.आई.आर में किसी दोषी व्यक्ति को नामजद तक नहीं किया। नतीजतन लाखों करोड़ों रुपए के गबन का मामला ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया गया।
गबन करने वाले इस क्लर्क को चार बार निलंबित किया गया किंतु संरक्षण देने वाले अधिकारियों की बदौलत वह हर बार बहाल हो जाता है। 19-06-2018 को यूनियन के प्रेस सचिव ने शिक्षा सचिव कृष्ण कुमार से इस गबन की जांच नए सिरे से करवाने की मांग की। इस काम के लिए तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया गया। एलीमेंट्री शिक्षा के निर्देशक इंदरजीत सिंह को उस कमेटी का चेयरमैन नियुक्त किया गया जबकि जिला शिक्षा अधिकारी रोपड़ दिनेश कुमार व डिप्टी कंट्रोलर फाइनेंस जगविंदर सिंह को उस कमेटी का मेंबर बनाया गया। इस कमेटी द्वारा 5 महीने की जांच के बाद भी उस क्लर्क को गबन का दोषी पाया गया। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में यहां तक लिखा कि कमेटी महसूस करती है कि उक्त राशि के अलावा और भी बेनामी राशि दूसरे खातों में जमा करवाई गई होगी परंतु बीपीओ दफ्तर कुराली में आग लगने के कारण उनके पास इस समय और कोई दस्तावेजी सबूत नहीं है।
इस कमेटी की रिपोर्ट के बाद 15- 4-2019 को डीपीआई कार्यालय द्वारा रिटायर्ड अतिरिक्त जिला व सेशन जज बी.सी. गुप्ता को जांच अधिकारी नियुक्त किया गया जिसकी रिपोर्ट 03-10-2019 को कार्यालय में जमा करवाई गई। इस रिपोर्ट में भी उस पर लगे सभी दोष सही साबित पाए गए किंतु पंजाबी कहावत 'शरीकां दे बोल सिर मत्थे- परनाला ओथे दा ओथे' की तर्ज पर उसे संरक्षण देने वाले अधिकारियों द्वारा फिर से बहाल करने की जुगत इस शर्त पर भिड़ा दी गई कि उसे गबन की गई राशि सरकारी खजाने में जमा करवानी होगी और प्राथमिक स्केल पर दोबारा काम करना होगा। जिस पत्नी को फर्जी अध्यापिका दिखाकर गबन किया गया उसे सजा देने की बजाय उसी परिवार की दुहाई देते हुए उसे दिनांक 16-03-2020 को फिर से बहाल कर दिया गया।   

शिक्षा विभाग पंजाब में भ्रष्टाचार का बोलबाला


गवर्नमेंट टीचर यूनियन के नेता सुच्चा सिंह खटड़ा और हरनेक सिंह मावी के अनुसार इन भ्रष्ट तत्वों के तार राजनेताओं व विभागीय अफसरों तक ही सीमित नहीं, वे बैंकों से भी बखूबी जुड़े हुए हैं, क्योंकि पता चला है कि उस समय की चेक लिस्ट बैंक से भी खुर्द- बुर्द कर दी गई हैं। इस गबन की तह तक पहुंचने के लिए अब सिर्फ एक ही रास्ता बचा है कि उस समय की कैशबुक दोबारा तैयार करवाई जाए और दोष साबित हो जाने पर इस काम पर होने वाले सारे खर्च की भरपाई दोषी कर्मचारियों व अधिकारियों से की जाए।

 
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