ENGLISH HINDI Wednesday, August 12, 2020
Follow us on
 
राष्ट्रीय

विकास दुबे एनकाउंटर— जरूरी या मजबूरी

July 12, 2020 10:50 AM

— एफ.पी.एन.
विकास दुबे एनकाउंटर पर उत्तर प्रदेश के लगभग सभी नेता चुप्पी साधे हुए हैं। लग रहा है कि वे सब मन ही मन शब्दों के जोड़-घटा में लगे हैं। कहीं कोई शब्द गलत बोला गया, तो बाद में लोगों को क्या जवाब देंगे? राष्ट्रीय व ऑनलाइन मीडिया पर क्या-क्या कहा जा रहा है, किस किस तरह के कयास लगाए जा रहे हैं? सी.एम. सहित उनके सभी मंत्री, मध्य प्रदेश सरकार के सभी जिम्मेदार लोग मीडिया द्वारा किए जा रहे मंथन पर कान और ध्यान लगाए हुए हैं। दरअसल एनकाउंटर दिखाते हुए पुलिस से कई गंभीर चूक हुई हैं जिसे अब ना तो छुपाया जा सकता है और ना सुधारा जा सकता है। कहा तो यह भी जा रहा है कि पुलिस द्वारा दिखाए जा रहे एनकाउंटर की पटकथा इतनी ढीली-ढाली और निकम्मी लिखी गई कि अब देश का 10वीं फेल नागरिक भी 5 मिनट में अंदाजा लगा लेता है कि मौका-ए-वारदात पर क्या-क्या हुआ होगा? यूं भी कहा जाता है कि चोर कितना भी चालाक क्यों ना हो, कोई ना कोई सुराग छोड़ ही जाता है। विकास दुबे एनकाउंटर में तो स्पेशल टास्क फोर्स ने इतने ज्यादा सुराग छोड़ दिए कि कहानी हिट होने की बजाय पहले ही शो में पिट गई। अब इस पिटी हुई कहानी के निर्माता- निर्देशक बोलें तो बोलें क्या?   

सोचा तो यह था कि विकास दुबे की दबंगाई का जितना इस्तेमाल किया जा सकता था, कर लिया है। उत्तर प्रदेश की भाषा में कहें कि अब वह "डेढ़ सियाणा" होने लगा था। दबंगाई के साथ पैसा आया, पैसे से पावर आई और अब पावर के साथ उसे राजनीति की समझ भी आने लगी थी, अतः उसका इस्तेमाल करना मुश्किल हो रहा था। कहीं-कहीं तो वो ही राजनेताओं और अफसरों को अच्छे से छका जाता था अतः उसकी कहानी का खत्म होना आवश्यक था। पुलिस का उसके घर जाना, वहां पर उसके कारिंदों द्वारा पुलिस पार्टी पर हमला किया जाना, आठ पुलिसकर्मियों का मारा जाना, विकास दुबे का साथियों व परिवार सहित फरार हो जाना कसावट लिए हुए जोरदार पटकथा वाली कहानी थी। वैसे उसके साथियों का पकड़ा जाना, कुछ का मारा जाना और उज्जैन के महाकाल मंदिर की भीड़-भाड़ वाली जगह पर उसके द्वारा आत्मसमर्पण करना भी उस कहानी का कसा हुआ भाग हो सकता है। दरअसल अत्यंत कठिन काम में यदि सब कुछ सही से हो जाए तो अक्सर लोग अति उत्साही हो ही जाते हैं। कुछ ऐसा ही शायद इस कहानी में हुआ। यानी कानपुर पहुंच ही गए हैं, अब डर काहे का? यहीं असावधानी भरी एक के बाद एक चूक होती रही। मीडिया कर्मी पीछे लगे हुए थे। अतः एसटीएफ को अपना काम करने में कुछ दिक्कतें आ रही थी सो अंतिम घटनाक्रम में ढेर सारी चूक होती चली गई। 'किसी की जिंदगी ले लेना इतना आसान भी नहीं' अब पुलिस पार्टी को महसूस हो रहा था। अब तो शायद ताउम्र उन्हें यह महसूस होता ही रहेगा, अगर कहीं कुछ लोग एसटीएफ टीम पर धारा 302 का मुकदमा दर्ज करने पर अड़ गए। विकास दुबे के संस्कार में शामिल हुई उसकी पत्नी ऋचा ने मीडिया के सामने बदला लेने की धमकी भी दे दी। समाचार पत्रों में प्रकाशित उसके बयान के अनुसार 'जिसने जैसा सुलूक किया है, उन सबको सबक सिखाऊंगी। जरूरत पड़ी तो बंदूक भी उठाऊंगी। नादानी या बेचैनी में दिया गया उसका इस तरह का बयान हालांकि उसके लिए बहुत बड़ा खतरा सिद्ध हो सकता है।
अब बात संविधान और कानून की:
सवाल खड़ा होता है लोकतंत्र की परंपरा का। अपराधी को कड़ी सजा मिले, यह हर कोई चाहता है। परंतु व्यवस्था में सुधार करने की बजाय तालिबानी तरीका अपनाने की परंपरा क्या स्वस्थ परंपरा सिद्ध होगी। अगर अपराधी को ऐसे ही सजा दी जानी है तो भला न्यायपालिका का इतना बड़ा तंत्र खड़ा करने और उसका पोषण करने की क्या आवश्यकता है? नि:संदेह भारतीय न्याय व्यवस्था में अनेकों झोल हैं जिस का सहारा लेकर अपराधी व्यक्ति अक्सर कानून के हाथ से बच जाता है। किंतु उस न्याय व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पाया पुलिस तंत्र ही है। भ्रष्ट पुलिस तंत्र के कारण ही तो अक्सर गरीब लोग आज न्याय से वंचित रह जाते हैं। यदि इसी तंत्र को न्याय करने का अधिकार भी मिल गया तो देश और समाज की क्या दुर्दशा हो सकती है, उसकी कल्पना हर कोई आसानी से कर सकता है। वैसे भी कहा जाता है कि जब हम किसी को जिंदगी दे नहीं सकते तो जिम्मेदार पद पर रहते हुए उसे लेने का हक हमें कैसे मिल सकता है? दरअसल अपराधी को सजा के अंजाम तक पहुंचाने हेतु कितनी लगन व मेहनत की जरूरत होती है, वह हम सब जानते हैं। उस मेहनत से बचने का एक आसान रास्ता है एनकाउंटर! यानी ना रहेगा बांस और ना बजेगी बांसुरी! लेकिन पुलिस जैसे जिम्मेदार विभाग की ऐसी कार्रवाई को सलाम करना हमारी कितनी बड़ी नादानी होगी, यह निकट भविष्य में हमें महसूस होने लगेगा। इसे पुलिस कर्मियों की नादानी कहकर भी नहीं छोड़ा जा सकता। क्योंकि यह एनकाउंटर एक सोची-समझी साजिश के तहत किया गया। सरकारों द्वारा पुलिसकर्मियों की इस शैतानी पर उनकी पीठ थपथपाना आने वाले समय में इन्हीं सरकारों को उस समय बहुत महंगा पड़ेगा जब उनके द्वारा किए गए किसी गुनाह की सजा पुलिस खुद ही तुरंत देने पर आमादा हो जाएगी। आज सरकारों में यह चेतना आना अति आवश्यक है क्योंकि बाद में तो फिर रेत को मुट्ठी में बंद करने जैसा कर्म ही बाकी रह जाएगा।

(लेखिका अनुभवी एवं वरिष्ठ पत्रकार है)

 
कुछ कहना है? अपनी टिप्पणी पोस्ट करें
 
और राष्ट्रीय ख़बरें
जाने माने शायर और गीतकार राहत इंदौरी का आज निधन, कोरोना संक्रमण उपरांत थे भर्ती एम्स ऋषिकेश में दो कोविड पॉजिटिव रोगियों की मौत, 34 की रिपोर्ट पॉजिटिव प्रधानमंत्री ने मुख्‍यमंत्रियों के साथ कोविड-19 से निपटने के लिए भविष्‍य की योजना के बारे में की चर्चा हिमालय क्षेत्र में गर्म पानी के स्रोत करते हैं वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्‍साइड का उत्‍सर्जन अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के लिए पनडुब्‍बी के‍बल कनेक्टिविटी की शुरुआत वायरोलॉजी इंस्टीट्यूट की स्थापना के लिए केंद्र द्वारा प्रस्ताव मंज़ूर स्वतंत्रता दिवस पर देखो अपना देश वेबिनार श्रृंखला के अंतर्गत पांच वेबिनारों का आयोजन जिन विक्रेताओं के पास पहचान पत्र और विक्रय प्रमाणपत्र नहीं, उन्हें पीएम स्वनिधि योजना में शामिल करने हेतु अनुशंसा पत्र मॉड्यूल लॉन्च कोरोना योद्धाओं के लिए ईएनसी बैंड ने किया लाइव प्रदर्शन आईएमडी द्वारा मौसम पूर्वानुमान पर लघु वीडियो हिंदी और अंग्रेजी दोनों में