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चंडीगढ़

अफसरों के ऐशो आराम की जगह है - सिटी ब्यूटीफुल

August 11, 2020 09:10 PM

संंतोष गुप्ता

चंडीगढ, एफपीएन:
नए अफसर को नया जैसा मकान चाहिए, नई लुक वाला ऑफिस भी। नई योजनाएं और नए प्रोजेक्ट, वह भी ऐसे कि एकबारगी तो लोगों को दीवाना कर जाएं। मंजे हुए खिलाड़ी भी चारों खाने चित। मीडिया में वाह! वाह! का इतना शोर कि विरोध करने या कुछ पूछने वालों की बोलती बंद। लेकिन शहर का हाल बद से बदतर। दो सड़कें बनाई जाएंगी तो चार टूट जाएगी। पानी, बिजली, सीवरेज सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं की सच्चाई सबके सामने है। शहर वासियों को 24 घंटे पानी मुहैया करवाने का राग पिछले लगभग 20 सालों से निरंतर गाया जा रहा है, कजौली वाटर वर्क्स से 6 लाइनों से पानी आ भी रहा है, इस पर भी शहर को जलापूर्ति ट्यूबवेल से की जा रही है। केंद्रीय भूजल मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने पिछले साल देशभर में 254 ऐसे जिलों की सूची तैयार की थी जहां तेजी से भूजल का स्तर गिर रहा है। इस सूची में चंडीगढ़ का नाम भी शामिल था। प्राप्त जानकारी के अनुसार शहर में 287 ट्यूबेल थे जिनमें 31 तो काफी देर से बंद पड़े हैं। नगर निगम चंडीगढ़ ने 56 ट्यूबेल को बंद करवा दिया। केंद्र से रिपोर्ट आने के बाद एडवाइजर मनोज परिंदा ने डीसी मंदीप बराड़ व निगम कमिश्नर केके यादव से इस बारे में विचार विमर्श भी किया। विचार विमर्श में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को चेक करना, पानी का पुनः उपयोग, वाटर बॉडी को रीजेनरेट करना, प्लांटेशन ड्राइव व बड़े स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम चलाने की वही बरसों पुरानी बातें हुई। सिटी ब्यूटीफुल की कड़वी सच्चाई यह है कि योजनाएं शुरू तो बड़े जोर-शोर से की जाती है किंतु आवश्यक देखभाल के अभाव में कबाड़ होकर रह जाती हैं। मिसाल के तौर पर वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम कई सरकारी इमारतों व स्कूलों में लगाए गए थे, किंतु देखरेख के अभाव में अधिकतर सिस्टम बेकार पड़े हैं। केंद्र शासित प्रदेश में आने वाले गांवों के तालाबों को गोद लेने की योजना भी पूरे तामझाम के साथ शुरू हुई मगर आज यह योजना भी ठंडे बस्ते के हवाले की जा चुकी है।
स्ट्रीट-लाइट और सीवरेज का हाल भी कुछ ऐसा ही है। वर्ष 2009 में चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड की तरफ से 1120 परिवारों को पुनर्वास योजना के तहत शहर के सेक्टर 38 वेस्ट में बसाया गया था। लोग वहां किस प्रकार का नर्क भोग रहे हैं, कोई अफसर देखने या जानने की कोशिश नहीं करता। सीवरेज का गंदा पानी सड़कों पर बहता हुआ पुकार- पुकार कर प्रधानमंत्री के "स्वच्छ- भारत" व "गंदगी भगाओ" जैसे नारों की खिल्ली उड़ा रहा है। उस पर तुर्रा यह कि इस इलाके के लिए बनने वाली डिस्पेंसरी को सिरे से ही गायब कर दिया गया। बरसात के इस मौसम में भी सीवरेज ब्लाक हैं, स्ट्रीट लाइटें जलती नहीं, पार्क में उगी बड़ी-बड़ी घास में सांप जैसे जहरीले जानवरों का डेरा है, जगह-जगह कूड़े के ढेर लगे रहते हैं जिन्हें कई- कई दिनों तक नहीं उठाया जाता। यहां राम राज्य नहीं, बदबू का साम्राज्य है, लेकिन शहर की ऑफिसर लॉबी को आजकल तो वार- रूम से ही फुर्सत नहीं मिलती। शहर वासियों के प्रतिनिधि वो चाहे सांसद हों या पार्षद अपने प्रत्येक कार्य के लिए अफसरशाही पर निर्भर हैं। और अधिकारी हैं कि उन्हें पता है, आज यहां हैं तो कल यहां नहीं होंगे। अतः ज्यादा जिम्मेदारी लेने की जरूरत क्या है?
इस शहर की एक और बड़ी त्रासदी यह है कि जब भी कोई नया अफसर आता है तो सरकारी खर्चे से अपने कार्यालय और आवास को रिनोवेट करवाता है। अपने खर्चे पर जो काम दो- ढाई लाख में आसानी से हो सकता है। सरकारी धन से वही काम 20-22 लाख में भी मुश्किल से होता है। इंजीनियर विकास शर्मा के अनुसार सिटी ब्यूटीफुल में पोस्टिंग होने का मतलब है ऐश! केंद्र से मिलने वाले पैसे से बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाओ। आनन-फानन में लागू करवाओ और जब परिणाम आने का वक्त हो तो चलते बनो। कहीं कोई जिम्मेदारी नहीं? तर्क बड़ा वाजिब है कि जब यहां है ही नहीं तो जिम्मेदारी कैसी? योजना पहले ऑफिसर की है तो खराब रिजल्ट का ठीकरा मेरे सिर क्यों? यानी चित भी मेरी पट भी मेरी। लोग जाएं पार्क में घास चरने।

 
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