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बनारस सिल्क साडि़यों का केन्द्र— साडि़यों की विशेषताएं

August 22, 2020 02:24 PM

बनारस जिसे बेनारस या वाराणसी के नाम से भी जाना जाता है। गंगा नदी के पश्चिमी तट पर उत्तर प्रदेश राज्य में स्थित है और इसे दुनिया के लगातार बसे हुए सबसे पुराने शहरों में से एक माना जाता है। रॉल्फी फिच (1583-91) ने बनारस का सूती कपड़ा उद्योग के फलते-फूलते क्षेत्र के रूप में वर्णन किया था। पहली सहस्त्राब्दी- के अनेक बौद्धग्रंथों में बेनारस का एक उत्तम वस्त्र बुनाई केन्द्र के रूप में वर्णन है।

दुनिया के सबसे पुराने शहरों में से एक, यह वह स्थान है, जहां हजारों लोग दुनिया के इस सबसे पुराने जीवंत शहरों में से एक, इस शहर में शांति, स्थिरता, आध्यात्मिकता और निश्चित रूप से शुद्ध रेशम की तलाश में आते हैं। यह जहां हिंदू देवी-देवताओं का निवास स्थान है, वहीं बनारस सिल्क की साड़ियों का केन्द्र है।
बनारसी सिल्क साडि़यां:
सोलह श्रृंगारों के साथ बनारसी सिल्क साड़ी पहने एक भारतीय महिला, प्रत्ये़क भारतीय पुरूष की ड्रीम गर्ल है। भारत में शायद ही कोई ऐसी महिला होगी, जिसकी अलमारी में बनारसी साडि़यां न रहती हों। यहां तक कि दुल्हन का दहेज भी इस बेहद मांग वाली साड़ी के बिना अधूरा है। बनारसी साड़ी किसी महिला को इतना आकर्षण प्रदान करती है, जिसका किसी अन्य ड्रेस से मुकाबला करना मुश्किल है, लेकिन इस आकर्षण के पीछे एक बुनकर है, जिसका कौशल और प्रतिभा इतना शानदार पहनावा तैयार करती है। कुछ बुनकरों की वंशावली 990 ईस्वी पूर्व की है। बनारसी सिल्क साडि़यां मुगलकाल में 1600 ईस्वी के दौरान प्रसिद्धि के मुकाम तक पहुंची। उस समय साडि़यों के परम्पारागत नमूनों में बदलाव आया। उस समय भारतीय और ईरानी नमूनों को मिलाकर साडि़यां बनाई जाने लगी। बनारस के ब्रोकेड और जरी वस्त्रों का पहला जिक्र 19वीं शताब्दी में देखने को मिला। मुगलकाल के दौरान यानी 14वीं शताब्दी के आसपास सोने और चांदी के धागों का इस्ते माल करते हुए महीन डिजाइनों के साथ ब्रोकेड की बुनाई बनारस की विशेषता बन गई। डिजाइन की जटिलता को देखते हुए एक बनारसी साड़ी को पूरा करने में 15 दिन से लेकर कई महीने लग जाते है।
बनारसी सिल्की साडि़यों की विशेषताएं:
बनारसी सिल्की साडि़यों की गिनती ऐतिहासिक दृष्टि से भारत की सबसे बेहतरीन साडि़यों में होती है और वे अपने सोने और चांदी के ब्रोकेड शानदार सिल्कत और कीमती कढाई तथा अधिकतम मांग के लिए मशहूर है। इन साडि़यों को बेहतरीन तरीके से बुने हुए रेशम से बनाया जाता है और उन्हें बारीक डिजाइन के साथ सजाया जाता है। उकेरी हुई नक्काेशी के कारण ये साडि़यां अन्य‍ साडि़यों की तुलना में भारी होती हैं। इनकी विशेषता मुगल प्रेरित डिजाइन हैं। जैसे कि फूल-पत्तियों के गूंथे हुए बारीक नमूने लगा और बेल, ऊपर की ओर तार से सज्जित पत्तियां, जिसे झालर कहा जाता है, बॉर्डर का किनारा इन साड़ियों की विशेषता है। अन्य विशेषताओं में भारी सोने का काम, ठोस बुनाई, संक्षिप्तॉ विवरणों के साथ आकृतियां, धातु जैसा प्रभाव, पल्लूत, जाल (जाल जैसा नमूना) और मीनाका काम शामिल हैं।
साड़ी बनाने वाले क्षेत्र:
साड़ी बनाने का काम एक कुटीर उद्योग है। वाराणसी, गोरखपुर, चंदौली, भदोही, जौनपुर और आजमगढ़ जिलों के आसपास के क्षेत्र के हथकरघा रेशम उद्योग के साथ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से करीब 12 लाख लोग जुड़े हुए हैं।
बनारसी ब्रोकेड:
ब्रोकेड शब्दे लैटिन भाषा के शब्द ‘‘ब्रोकेयर’’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘छेद करना’ और यह कढ़ाई जैसे सुई से किये जाने वाले कार्य का द्योतक है। शायद यही कारण है कि ब्रोकेड की बुनाई की तकनीक को अकसर ‘कढ़ाई वाली बुनाई’ के रूप में परिभाषित किया जाता है। आमतौर पर ब्रोकेड शब्द रेशम और सोने या चांदी से पूर्ण रूप से बुने गए डिजाइन वाले वस्त्र तक सीमित है। डिजाइन और नमूने पर आधारित बनारसी ब्रोकेड और इस्तेेमाल की जाने वाली सामग्री के प्रकार को निम्नहलिखित श्रेणियों में वि‍भाजित किया जा सकता हैं - ओपेक जरी ब्रोकेड, अम्नी ब्रोकेड, तन्चोई ब्रोकेड, बनारस ब्रोकेड, जरी ब्रोकेड और कीनखाब ब्रोकेड।
बनारसी सिल्कट साडि़यों के अन्य रूप।
जामदानी सिल्का:
बनारस की परम्पारागत साड़ियों में से एक जामदानी सिल्कग है जो ब्रोकेड या `बेल-बूटेदार मलमल` की तकनीकी किस्म है। कारीगर जामदानी साड़ियों में परम्पसरागत नमूनों को शामिल करते हैं जिसमें चमेली, पन्ना हजार, गेंदाबूटी, पान बूटी, तिरछा आदिशामिल हैं। सबसे आकर्षक डिजाइनों में कोनिया या कोने का नमूना जिसे पुष्प आम बूटा नाम दिया गया है।
जंगला साड़ी-बनारस में बनी एक विशिष्ट साड़ी जंगला साड़ी है जिसे बेतहाशा कटावदार डिजाइन और फैलते हुए वनस्पति नमूनों से सजाया जाता है। इसे पूर्व में मिलने वाली गुलाब साड़ियों में से एक कहा जाता है और इसे जंगला के नमूनों, सोने की लताओं और चांदी के फूलों से सजाया जाता है। मूगा सिल्कल में बार्डरको लताओं और सोने और चांदी-जरी के धागों से से सुशोभित कियाजाता है। साड़ी का आखिरी छोर बार्डर के नमूनों के मिश्रण से तैयार किया जाता है। साड़ियों को स्टाइलिशबनाने और तड़क-भड़क प्रदान करने के लिए, जल जंगला डिज़ाइन और कभी-कभी मीना का काम भी शामिल किया जाता है।
बूटीदार साडि़यां -
ये बनारस में बनने वाली सबसे प्रसिद्ध साड़ियों में से एक हैं। इस विशेष प्रकार की साड़ी की सबसे बड़ी खासियत सोना, चांदी और रेशम के ब्रोकेड हैं। गंगा-जमुना एक विशेष डिजाइन है जिसेआखिरी छोर में मेहराबों की पंक्ति के साथ गहरे रंग के सोने और हल्के चांदी की छाया के साथ बनाया जाता है। बूटीदार साड़ी एक पारंपरिक बनारस की साड़ी है जो असली सोने और चांदी की जरी और कतान सिल्कह के साथ बाने में नमूनों की प्रभावशाली श्रृंखला के साथ सुशोभित किया जाता है। इस गहरे नीले रंग की रेशमी साड़ी की सबसे खास बात यह है कि यह सोने, चांदी और रेशम के पैटर्न के धागों से युक्त ब्रोकेड है।
टिशू साड़ियाँ-
बनारस के मशहूर ज़री ब्रोकेड बुनकरों ने टिशू सामग्री को बुनकर एक तकनीक विकसित की है जो सुनहरे कपड़े की तरह दिखाई देती है। बाने में ज़री बनाकर ज़री और रेशम अतिरिक्त-बाना (पैटर्न धागा) और बाने में रेशम को जोड़कर चलाने से, इस साड़ी की बुनाई का नमूना मंद प्रकाश वाले तालाब में तैरते हुए सुनहरे कमल की तरह तैयार किया जाता है।कटवर्क तकनीक द्वारा 'पानी की बूंदें' बनाई जाती हैं। साड़ी के बार्डर और अंतिम छोर में हीरे जडि़त नमूने और पेसली नमूने होते हैं। टिशू साडि़यां विवाह की साड़ियों के रूप में सबसे लोकप्रिय हैं।
कटवर्क साड़ी-
इस प्रकार की साड़ी फ्लोटेटधागे को हटाने के बाद सादे ग्राउंड टेक्सचर पर कट वर्क तकनीक द्वारा तैयार की जाती हैं जो बुनाई की प्रक्रिया के दौरान डिजाइन (बुने हुए) नहीं होते हैं जो अच्छी पारदर्शी आकृति प्रदान करते हैं। कट वर्क जामदानी वैरायटी का सस्ता संस्करण है।
जरी और रेशम के साथ ऑरगेंजा साड़ी (कोरा):
एक पारदर्शी, पंख की तरह खुला बुना हुआ कपड़ा जो रेशम के महीन कपड़े की तुलना में थोड़ी भारी और कड़क होती है। यह कोमल, एक जैसी फिनिश और विशिष्ट चमक होती है, मजबूती से लिपटे हुए धागे के कारण इसमें कड़ापन होता है। नाजुक रेशम पर विस्तृथत हाथ की कढ़ाई का उपयोग इसे सुंदरता का प्रतीक बना देता है।
जॉर्जट साड़ी -
जॉर्जट कपड़ा पारंपरिक रूप से रेशम से बना कपड़ा है, हालांकि कभी-कभी सिंथेटिक फाइबर जैसे पॉलिएस्टर का भी उपयोग किया जाता है। यह शिफॉन की तुलना में थोड़ा भारी और अधिक अपारदर्शी है। कसे हुए क्रेप के रेशे जिससे रेशम के जॉर्जट कपड़े को बनाया जाता है, इसे लचीली गुणवत्ता प्रदान करते हैं जिससे यह अपने आप हिलता है। कुछ बढि़या सिल्कों के विपरीत, जॉर्जट कपड़ा भी असामान्य रूप से मजबूत होता है, और यह विभिन्न मौकों पर पहनने के लिए अच्छा होता है। चूंकि रेशम अत्यधिक शोषक है, इसलिए जॉर्जट कपड़े को आसानी से असंख्य रंगों में रंगा जा सकता है, या एक पैटर्न के साथ प्रिंट किया जा सकता है।
— डॉ. आर.के.पंत
सेवानिवृत्त उप सचिव (तकनीकी)

 
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