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राष्ट्रीय

पुरानी शिक्षा व्यवस्था बदलना उतना ही आवश्यक, जितना खराब हुआ ब्लैकबोर्ड: प्रधानमंत्री

September 12, 2020 11:14 AM

नई दिल्ली, फेस2न्यूज:
पिछले तीन दशकों में दुनिया का हर क्षेत्र बदल गया। हर व्यवस्था बदल गई। इन तीन दशकों में हमारे जीवन का शायद ही कोई पक्ष हो जो पहले जैसा हो। लेकिन वो मार्ग, जिस पर चलते हुए समाज भविष्य की तरफ बढ़ता है, हमारी शिक्षा व्यवस्था, वो अब भी पुराने ढर्रे पर ही चल रही थी। 21वीं सदी में पुरानी शिक्षा व्यवस्था को बदलना उतना ही आवश्यक था जितना किसी खराब हुए ब्लैकबोर्ड को बदलना आवश्यक होता है। जैसे हर स्कूल में पिन-अप बोर्ड होता है। उसमें तमाम जरूरी कागज, स्कूल के जरूरी आदेश, बच्चों की बनाई पेन्टिंग आदि आप लोग लगाते हैं। ये बोर्ड हर कुछ समय में भर भी जाता है। उस पिन-अप बोर्ड पर नई क्लास के नए बच्चों की नई पेन्टिंग्स लगाने के लिए आपको बदलाव करना ही पड़ता है। एक विशेष सम्मलेन में भाग ले रहे सभी राज्यों के विद्वानों, प्राचार्यगणों, शिक्षकगणों इत्यादि को संबोधन करते हुए ये कहा।
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति भी नए भारत की, नई उम्मीदों की, नई आवश्यकताओं की पूर्ति का सशक्त माध्यम है। इसके पीछे पिछले चार-पांच वर्षों की कड़ी मेहनत है, हर क्षेत्र, हर विधा, हर भाषा के लोगों ने इस पर दिन रात काम किया है। लेकिन ये काम अभी पूरा नहीं हुआ है। बल्कि अब तो काम की असली शुरुआत हुई है। अब हमें राष्ट्रीय शिक्षा नीति को उतने ही प्रभावी तरीके से लागू करना है। और ये काम हम सब मिलकर करेंगे। जानता हूं, राष्ट्रीय शिक्षा नीति का ऐलान होने के बाद आप में से बहुत लोगों के मन में कई सवाल आ रहे हैं। ये शिक्षा नीति क्या है? ये कैसे अलग है? इससे स्कूल और कॉलेजों की व्यवस्था में क्या बदलाव आएगा? इस शिक्षा नीति में एक शिक्षक के लिए क्या है? एक छात्र के लिए क्या है? और सबसे अहम, इसे सफलता पूर्वक लागू करने के लिए क्या क्या करना है, कैसे करना है? ये सवाल जायज भी हैं, और जरूरी भी हैं। और इसीलिए ही हम सब यहां इस कार्यक्रम में इकट्ठा हुए हैं ताकि चर्चा कर सकें, आगे का रास्ता बना सकें।
अध्यापगण खुद अपने हिसाब से शिक्षा साम्रगी तैयार करें, बच्चे अपना Toy म्यूजियम बनाएं, Parents को जोड़ने के लिए स्कूल में कम्यूनिटी लाइब्रेरी हो, तस्वीरों के साथ Multilingual Dictionary हो, स्कूल में भी किचेन गार्डन हो, ऐसे कितने ही विषयों की बात हुई है, अनेक नए Ideas दिए गए हैं।
अभी कुछ दिन पहले शिक्षा मंत्रालय ने भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने के बारे में देश भर के Teachers से Mygov पोर्टल पर उनके सुझाव मांगे थे। एक सप्ताह के भीतर ही 15 लाख से ज्यादा सुझाव मिले हैं। ये सुझाव राष्ट्रीय शिक्षा नीति को और ज्यादा प्रभावी तरीके से लागू करने में मदद करेंगे।
किसी भी देश के विकास को गति देने में उसकी युवा पीढ़ी और युवा ऊर्जा की बड़ी भूमिका होती है। लेकिन उस युवा पीढ़ी का निर्माण बचपन से ही शुरू हो जाता है। जैसा बचपन होगा, भविष्य का जीवन काफी कुछ उसी पर निर्भर करता है। बच्चों की शिक्षा, उन्हें मिलने वाला वातावरण, काफी हद तक यही तय करता है कि भविष्य में वो as a Person, कैसा बनेगा, उसकी Personality कैसी होगी। इसलिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति में बच्चों की Education पर बहुत ज्यादा जोर दिया गया है। प्री-स्कूल में तो बच्चा पहली बार माता-पिता की देखभाल और घर के आराम भरे माहौल से बाहर निकलने की शुरूआत करता है .. दूर होता है। ये वो पहला पड़ाव होता है जब बच्चे अपने Senses, अपनी Skills को ज्यादा बेहतर तरीके से समझना शुरू करते हैं। इसके लिये ऐसे स्कूल, ऐसे शिक्षकों की जरूरत है जो बच्चों को Fun Learning, Playful Learning, Activity Based Learning और Discovery Based Learning का Environment दें।
कोरोना के इस टाइम में, ये सब कैसे होगा? ये बात सोच से ज्यादा अप्रोच की है। और वैसे भी कोरोना से बने हालात हमेशा ऐसे ही तो नहीं रहेंगे। बच्चे जैसे-जैसे क्लास में आगे बढ़ें, उनमें ज्यादा सीखने की भावना का विकास हो, बच्चों का मन, उनका मस्तिष्क वैज्ञानिक और तार्किक तरीके से सोचना शुरू करे, उनमें Mathematical Thinking और Scientific Temperament विकसित हो, ये बहुत आवश्यक है। और Mathematical Thinking का मतलब केवल यही नहीं है कि बच्चे Mathematics के प्रॉब्लम ही सॉल्व करें, बल्कि ये सोचने का एक तरीका है। ये तरीके हमें उन्हें सिखाना है। ये हर विषय को, जीवन के पहलुओं को Mathematical और Logical रूप से समझने का दृष्टिकोण है, ताकि मस्तिष्क अलग-अलग perspective में analyse कर सके। ये दृष्टिकोण, मन और मस्तिष्क का ये विकास बहुत जरूरी है, और इसलिए ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इसके तौर-तरीकों पर बहुत ज्यादा ध्यान दिया गया है।
उन्होंने कहा कि हमें ये सुनिश्चित करना है कि जो भी बच्चा तीसरी कक्षा पार करता है, वो एक मिनट में 30 से 35 शब्द तक आसानी से पढ़ पाए। इसे आप लोग Oral Reading Fluency कहते हैं। जिस बच्चे को हम इस लेवल तक ला पाएंगे, shape कर पाएंगे, सिखा पाएंगे, तो भविष्य में उस विद्यार्थी को बाकी subjects का content समझने में और आसानी रहेगी। मैं इसके लिए आपको सुझाव देता हूं। ये जो छोटे-छोटे बच्‍चे हैं ..उनके साथ उनके 25-30 दोस्‍त भी होंगे क्‍लास में। आप उनको कहिए चलो भाई तुम कितनों के नाम जानते हो ... तुम बोलो। फिर कहो अच्‍छा तुम कितनी तेजी से नाम बता सकते हो, फिर कहिए तुम तेजी से भी बोलो और उसको वहां खड़ा भी करो। आप देखिए कितने प्रकार के talent develop होना शुरू हो जाएंगे और उसका confidence लेवल बढ़ जाएगा… बाद में लिखित रूप में साथियों के नाम रखके ..... चलो तुम इसमें से किस-किस के नाम बोलोगे, पहले फोटो दिखाके लिखा सकते हैं। अपने ही दोस्‍तों को पहचान कर सीखना ..... इसे लर्निंग की प्रक्रिया कहते हैं। इससे आगे की कक्षाओं में Students पर बोझ भी कम होगा, आप शिक्षकों पर भी burden कम होगा।
साथ ही, बेसिक गणित जैसे, Counting, Addition, Subtraction, Multiplication, Division, ये सब भी बच्चे आसानी से समझ सकेंगे। ये सब तभी होगा जब पढ़ाई किताबों और क्लास की चारदीवारियों से बाहर निकलकर वास्तविक दुनिया से जुड़ेगी, हमारे जीवन से, आस-पास के परिवेश से जुड़ेगी। आस पास की चीजों से, Real World से बच्चे कैसे सीख सकते हैं, इसका एक उदाहरण ईश्वरचंद्र विद्यासागर की एक कहानी में देखने को मिलता है। कहते हैं, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर जी जब आठ साल के थे, उन्हें तब तक अंग्रेजी नही पढ़ाई गयी थी। एक बार वो अपने पिता के साथ कोलकाता जा रहे थे, तो रास्ते में सड़क के किनारे उन्हें अंग्रेजी में लिखे Milestones दिखे। उन्होंने अपने पिता से पूछा कि यह क्या लिखा है? उनके पिताजी ने बताया कि इसमें कोलकाता कितनी दूर है, ये बताने के लिए इंग्लिश में गिनती लिखी है। इस उत्तर से ईश्वर चन्द्र विद्यासागर के बालमन में और जिज्ञासा बढ़ी। वो पूछते रहे और उनके पिताजी उन मील के पत्थरों पर लिखी गिनती बताते रहे। और, कोलकाता पहुँचते-पहुँचते ईश्वर चन्द्र विद्यासागर पूरी English की counting सीख गए। 1,2,3,4…7,8,9,10 ये है जिज्ञासा की पढ़ाई, जिज्ञासा से सीखने और सिखाने की शक्ति!
स्कूल में भी ऐसे skilled लोगों को बुलाया जा सकता है। वहाँ उनकी प्रदर्शनी, workshop लगाई जा सकती है। मान लीजिए गांव में जो मिट्टी के बर्तन बनाने वाले लोग हैं, एक दिन उनको बुला लिया, स्‍कूल के बच्‍चे देखें, फिर उनसे सवाल-जवाब करें, आप देखिए वो आराम से सीख लेगा। विद्यार्थियों की जिज्ञासा भी बढ़ेगी और जानकारी भी, सीखने में रुचि भी बढ़ेगी। ऐसे कितने ही प्रोफेशन हैं जिनके लिए deep skills की जरूरत होती है, लेकिन हम उन्हें महत्व ही नहीं देते, कई बार तो उन्हें छोटा समझ लेते हैं। अगर students इन्हें देखेंगे जानेंगे तो एक तरह का भावनात्मक जुड़ाव होगा, skills को समझेंगे, उनकी respect करेंगे।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति को इसी तरह तैयार किया गया है ताकि Syllabus को कम किया जा सके और fundamental चीज़ों पर ध्यान केन्द्रित किया जा सके। लर्निंग को Integrated एवं Inter-Disciplinary, Fun based और complete experience बनाने के लिए एक National Curriculum Framework develop किया जायेगा।ये भी तय किया गया है कि 2022 में जब हम आजादी के 75 वर्ष मनाएंगे, तो हमारे Students इस नए करिकुलम के साथ ही नए भविष्य की तरफ कदम बढ़ाएंगे। ये भी forward looking, future ready और scientific curriculum होगा। इसके लिए सभी के सुझाव लिए जाएंगे, और सभी के recommendations और modern education systems को इसमें समाहित किया जायेगा।
अंत में उन्होंने कहा कि मुझे विश्‍वास है, मेरे देश का शिक्षकगण, भारत के उज्‍ज्‍वल भविष्‍य के लिए इसको एक मिशन के रूप में लेगा, मन लगाकरके करेगा। देश का एक-एक बालक आपकी शिक्षा को ग्रहण करने के लिए तैयार होता है, आपके आदर्शों का पालन करने के लिए तैयार होता है, आपके इरादों को चरितार्थ करने के लिए तैयार होता है। वो दिन-रात मेहनत करने के लिए तैयार होता है। एक बार शिक्षक कह दे तो वो सब कुछ मानने को तैयार होता है। मैं समझता हूं कि मां-बाप, शिक्षक, शिक्षक संस्‍था, सरकारी व्‍यवस्‍था, हम सबको मिल करके इस काम को करना है। मुझे विश्‍वास है, ये जो ज्ञान यज्ञ चल रहा है, ये जो शिक्षा पर्व चल रहा है, 5 सितम्‍बर से ले करके लगातार अलग-अलग क्षेत्र के लोग इसको आगे बढ़ाने के काम में लगे हैं। ये प्रयास अच्‍छे परिणाम लाएगा ... समय से पहले परिणाम लाएगा। और सामूहिक कर्तव्‍य के भाव के कारण होगा।

 
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