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राष्ट्रीय

केंद्र से जम्मू-कश्मीर में पंजाबी का सरकारी भाषा का रुतबा तुरंत बहाल करने की माँग

September 09, 2020 08:23 AM

राज्य के अल्पसंख्यक आयोग में सिख को चेयरमैन नियुक्त करने की परंपरा बहाल हो- डॉ. कंवलजीत कौर,देश के अलग-अलग पंजाबी बोलने वाले क्षेत्रों में पंजाबी को दूसरी भाषा का सही दर्जा देने की माँग

 
 
चंडीगढ़:
 जम्मू-कश्मीर प्रदेश से पंजाबी भाषा का सरकारी रुतबा खत्म किये जाने पर गहरी चिंता प्रकट करते हुए ग्लोबल सिख कौंसिल ने भारत सरकार से माँग की है कि वहाँ के पंजाबियों की असीम भावनाओं को समझते हुए और इस क्षेत्र में पंजाबी के विकास और प्रसार को बरकरार रखने के लिए तुरंत जम्मू-कश्मीर राज भाषा बिल में संशोधन करते हुए दूसरी भाषाओं के साथ पंजाबी भाषा को भी सरकारी भाषा का दर्जा दिया जाये। 

एक साझे बयान में ग्लोबल सिख कौंसिल के प्रधान लेडी सिंह, डॉ. कंवलजीत कौर और पंजाबी कल्चरल कौंसिल के चेयरमैन हरजीत सिंह गरेवाल ने कहा कि जम्मू-कश्मीर इलाके में महाराजा रणजीत सिंह के नेतृत्व में 50 साल खालसा राज कायम रहा। लाखों पंजाबियों ने इस क्षेत्र की खुशहाली, तरक्की और विदेशी लुटेरों से सुरक्षा के लिए अपना कीमती योगदान दिया है जिस कारण जम्मू-कश्मीर की रियासत में पंजाबी भाषा को बनता रुतबा हासिल था परन्तु मौजूदा सरकार ने वहाँ के पंजाबियों के साथ घोर अन्याय करते हुए राज भाषा बिल 2020 में संशोधन करते समय पंजाबी को बाहर निकाल दिया जबकि पंजाबी की उप-भाषा डोगरी को शामिल कर लिया जोकि मूल भाषा के साथ बड़ी बेइन्साफी, धक्केशाही और अल्पसंख्यकों के भाषायी हकों को कुचलने के समान है जिसको जम्मू-कश्मीर क्षेत्र समेत देश-विदेश में बसते पंजाबी कभी भी सहन नहीं करेंगे।

भारतीय अल्पसंख्यक कौमों के प्रति केंद्र सरकार के सौतेले रवैये की कड़ी आलोचना करते हुए ग्लोबल सिख कौंसिल और पंजाबी कल्चरल कौंसिल के नेताओं ने कहा कि केंद्र की भाजपा सरकार ने जम्मू-कशमीर के पंजाबियों खासकर सिखों के साथ यह दूसरा द्रोह किया है क्योंकि धारा 370 तोड़ने के बाद गठित किये जम्मू-कश्मीर अल्पसंख्यक आयोग का किसी भी सिख को चेयरमैन या मैंबर नियुक्त नहीं किया गया जबकि रियासत में हमेशा इस आयोग का चेयरमैन या मैंबर के तौर पर सिख जरूर शामिल किया जाता रहा है और यह पहली बार है कि केंद्र सरकार ने रियासत की अल्पसंख्यक कौम के तौर पर सिखों के साथ सीधा अन्याय और भेदभाव किया है।

ग्लोबल सिख कौंसिल और पंजाबी कल्चरल कौंसिल ने पंजाब के समूह संसद सदस्यों को भी अपील की है कि वह पार्टी स्तर से ऊपर उठकर माँ-बोली की रक्षा करते हुए लोकसभा के मॉनसून सत्र के दौरान केंद्र सरकार द्वारा यह पंजाबी भाषा विरोधी बिल पास कराने का डटकर विरोध करें।

भारतीय अल्पसंख्यक कौमों के प्रति केंद्र सरकार के सौतेले रवैये की कड़ी आलोचना करते हुए ग्लोबल सिख कौंसिल और पंजाबी कल्चरल कौंसिल के नेताओं ने कहा कि केंद्र की भाजपा सरकार ने जम्मू-कशमीर के पंजाबियों खासकर सिखों के साथ यह दूसरा द्रोह किया है क्योंकि धारा 370 तोड़ने के बाद गठित किये जम्मू-कश्मीर अल्पसंख्यक आयोग का किसी भी सिख को चेयरमैन या मैंबर नियुक्त नहीं किया गया जबकि रियासत में हमेशा इस आयोग का चेयरमैन या मैंबर के तौर पर सिख जरूर शामिल किया जाता रहा है और यह पहली बार है कि केंद्र सरकार ने रियासत की अल्पसंख्यक कौम के तौर पर सिखों के साथ सीधा अन्याय और भेदभाव किया है।

उन्होंने कहा कि पंजाबियों ने देश की सेना, पुलिस, प्रशासन, उद्योग, खेती और शैक्षिक क्षेत्र में देश के लिए अमूल्य योगदान दिए हैं जिस कारण भाजपा सरकार सिखों के साथ अपनी भेदभावपूर्ण नीति को त्याग कर संविधान के अनुच्छेद 29 की रौशनी में देश में अल्पसंख्यक सिखों के अधिकारों की हिफाजत के लिए काम करे जिससे सिखों में रोष और बेगानेपन की भावना न पनपे। ग्लोबल सिख कौंसिल ने केंद्र सरकार से यह भी माँग की है कि कीमती इतिहास और असीम साहित्य के साथ भरपूर पंजाबी भाषा को देश के अलग-अलग राज्यों के पंजाबी बोलने वाले क्षेत्रों में असली मायनों में दूसरी भाषा के तौर पर लागू करवाया जाये।

 
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