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एस्ट्रोलॉजी

10 अक्तूबर , बुधवार से शुक्ल पक्ष से आश्विन शरद् नवरात्र आरंभ, इस बार पूरे 9 दिन शुभ रहेंगे नवरात्र

October 09, 2018 07:35 PM

मदन गुप्ता सपाटू ज्योतिर्विद्, चंडीगढ़ ,98156-19620

 अक्टूबर महीने में कई बड़े व्रत.त्योहार हैं। जिसमें नवरात्रि दशहरा और करवा चौथ प्रमुख है। पूरे महीने लगभग 20 छोटे और बड़े तीज त्योहार होंगे। पितृ पक्ष के खत्म होने के बाद 10 अक्टूबर से नवरात्रि शुरू हो रहे हैं। नवरात्रि के खत्म होने के बाद दशहरा मनाया जाएगा। उसके बाद करवा चौथ और शरद पूर्णिमा जैसे व्रत और त्योहार भी अक्टूबर महीने में है।
10 अक्तूबर से आश्विन मास के शुक्ल पक्ष के नवरात्र आरंभ हो रहे हैं जो 18 तारीख तक रहेंगे। विजय दशमी इस बार 18 तथा 19 दोनों दिन मनाई जाएगी। दिन का निर्णय स्थानीय कमेटियां करेंगी।
आदिशक्ति के 9 स्वरुपों की आराधना का यह पर्व प्रथम तिथि को क्लश स्थापना से आरंभ होता है।
नवरात्र के नौ दिनों में तीन देवियों - महाकाली, महालक्ष्मी तथा महा सरस्वती एवं दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं।शास्त्रों में दुर्गा के नौ रुप बताए गए हैं। इस नवरात्र में श्रद्धालु अपनी शक्ति, सामर्थ्य व समयानुसार व्रत कर सकते हैं। इस अवधि में क्रमशः शैल पुत्री, ब्रहमचारिणी,चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी तथा सिद्धिदात्री देवी की पूजा की जाती है।
नवरात्र जीवन शैली को बदलने, चेतना जगाने , स्थिरता, दृढ़ता, शांति, समर्पण, नियंत्रण, समृद्धि, सामंजस्य, सेवाभाव, कर्मशीलता, सहनशीलता, मानसिक व शारीरिक अनुशासन, कर्मशीलता, एकाग्रता, मातृशक्ति को पहचानने और इसे एक नौ दिवसीय पर्व के रुप में मनाने का अवसर है जब ऋतु परिवर्तन दस्तक दे रहा होता है।

नवरात्र की तिथियां
10 अक्टूबर . शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी पूजा
11 अक्टूबर . चंद्रघंटा पूजा
12 अक्टूबर . कुष्मांडा पूजा
13 अक्टूबर . स्कंदमाता पूजा
14 अक्टूबर . सरस्वती पूजा
15 अक्टूबर . कात्यायनी पूजा
16 अक्टूबर . कालरात्रि,सरस्वती पूजा
17 अक्टूबर . महागौरी, दुर्गा अष्टमी ,नवमी पूजन
18 अक्टूबर .नवमी हवन, नवरात्रि पारण
19 अक्टूबर. विजयादशमी, दुर्गा विसर्जन
घट अथवा क्लश स्थापना का शुभ समय
प्रातः 06 बजकर 03 मिनट से 07 बजकर 26 मिनट तक
अभिजीत मुहूर्त में 11 बजकर 51 मिनट से 12.39 बजे तक

प्रथम दिवस पर माता शैलपुत्री की आराधना की जाती है। इनका संबंध सूर्य से भी माना गया है। अतः जिन्हें हडिड्यों का रोग सताता है, उन्हें आज अवश्य मनोकामना की प्रार्थना करनी चाहिए। इसके अतिरिक्त जिनके जीवन में अस्थिरता है, उन्हें दृढ़ता लाने के लिए अवश्य आराधना करनी चाहिए।
कैसे करें घट स्थापना ?
प्रातःकाल स्नान करें, लाल परिधान धारण करें । घर के स्वच्छ स्थान पर मिटट्ी से वेदी बनाएं। वेदी में जौ और गेहूं दोनों बीज दें। एक मिटट्ी या किसी धातु के कलश पर रोली से स्वास्तिक का चिन्ह बनाएं। कलश पर मौली लपेटें। फर्श पर अष्टदल कमल बनाएं। उस पर कलश स्थापित करें । कलश में गंगा जल, चंदन, दूर्वा, पंचामृत, सुपारी, साबुत हल्दी, कुशा, रोली, तिल, चांदी डालें । कलश के मुंह पर 5 या 7 आम के पत्ते रखें। उस पर चावल या जौ से भरा कोई पात्र रख दें । एक पानी वाले नारियल पर लाल चुनरी या वस्त्र बांध कर लकड़ी की चौकी या मिटट्ी की बेदी पर स्थापित कर दें । बहुत आवश्यक है नारियल को ठीक दिशा में रखना। इसका मुख सदा अपनी ओर अर्थात साधक की ओर होना चाहिए। नारियल का मुख उसे कहते हैं जिस तरफ वह टहनी से जुड़ा होता है। यह गलती कई बार अज्ञानतावश कई सुयोग्य कर्मकांडी भी कर जाते हैं परंतु आप इसे शास्त्र सम्मत विधि अनुसार ही करें। और पूजा करते समय आप अपना मुंह सूर्योदय की ओर रखें । इसके बाद गणेश जी का पूजन करें। वेदी पर लाल या पीला कपड़ा बिछा कर देवी की प्रतिमा या चित्र रखें। आसन पर बैठ कर तीन बार आचमन करें । हाथ में चावल व पुष्प लेकर माता का ध्यान करें और मूर्ति या चित्र पर समर्पित करें। इसके अलावा दूध, शक्कर, पंचामृत, वस्त्र, माला, नैवेद्य, पान का पत्ता, आदि चढ़ाएं। देवी की आरती करके प्रसाद बांटें और फलाहार करें।
जौ या खेतरी बीजना
इसी समय मिटटी के गमले या मिटटी की बेदी पर जौ बीज कर , आम के पत्तों से ढंक दे, तीसरे दिन अंकुर निकल आएंगे। जौ नौ दिनों में बड़ी तेजी से बढ़ते हैं और इसकी हरियाली परिवार में धन धन्य, सुख समृद्धि का प्रतीक है ताकि संपूर्ण वर्ष हमारा जीवन हरा भरा रहे।


अख्ंाड ज्योति एवं पाठ
यदि संभव हो और सामर्थय भी हो तो देसी घी का अखंड दीपक जलाएं। इसके आस पास एक चिमनी रख दें ताकि बुझ न पाए। दुर्गा सप्तशी का पाठ करें।
माता की आराधना के समय यदि आप को कोई भी मन्त्र नहीं आता हो तो आप केवल दुर्गा सप्तशती में दिए गए नवार्ण मंत्र ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे से सभी पूजा कर सकते हैं। यही मंत्र पढ़ते हुए सामग्री चढ़ाएं। माता शक्ति का यह अमोघ मन्त्र है। जो भी यथा संभव सामग्री हो आप उसकी चिंता न करें कुछ भी सुलभ न हो तो केवल हल्दी अक्षत और पुष्प से ही माता की आराधना करें संभव हो श्रृंगार का सामान और नारियल.चुन्नी जरुर चढ़ाएं। एक ही बात का ध्यान रखें माँ शक्ति ही परब्रह्म हैंए उन्हें आप के भाव और भक्ति चाहिए सामग्री नहीं। इसलिए जो भी सामग्री आप के पास उपलब्ध हो वही बिलकुल भक्ति भाव और समर्पण के साथ माँ को अर्पित करें। धन और सामग्री के अभाव में अपने मन में दुख अथवा ग्लानि को स्थान न दें। आप एक ही मंत्र से पूजा और आरती तक कर सकते हैं।
क्या है दुर्गा सप्तशी में?
इसमें 700 श्लोक ब्रहमा, वशिष्ठ व विश्वामित्र द्वारा रचित हैं ,इसीलिए इसे सप्तशी कहते हैं ।इसमें 90 मारण के, 90 मोहन के, 200 उच्चाटन के, 200 स्तंभन के,60- 60 विद्वेषण के कुल मिला कर 700 श्लोक हैं। यह तंत्र व मंत्र दोनों का अद्वितीय संपूर्ण ग्रंथ है ।इनका दुरुपयोग न हो इसलिए , तीनों विद्वानों ने इन्हें श्रापित भी कर दिया। अतः पहले शापोद्वार के 20 मंत्र पढ़ कर ही दुर्गा सप्तशी का पाठ आरंभ होता है।
व्रत
पूरे नौ दिन अथवा सप्तमी ,अष्टमी या नवमी पर निराहार उपवास रखा जा सकता है। इस मध्य केवल फलाहार भी किया जा सकता है।
प्रकृति और नवरात्र
भारत में हर पर्व ऋतु, इतिहास, भूगोल, आकाशीय ग्रह एवं नक्षत्र परिवर्तन, विज्ञान, संस्कृति व परंपरा आदि से जुड़ा हुआ है। नवरात्र वस्तुतः दो ऋतुओं का संगम है जब 6 महीने बाद ऋतु परिवर्तन होता है। छः मौसम में गर्मी व सर्दी ही मुख्य रुप से मानव जीवन को प्रभावित करते हैं। सर्दी के समापन और गर्मी के आगमन पर वासंत नवरात्र भारत में मनाए जाते हैं। शरद ऋतु के आगमन पर शरद् नवरात्र मनाए जाते हैं। ऋतु परिवर्तन पर मन, मस्तिश्क, भौगोलिक, आध्यात्मिक, प्राकृतिक बदलाव स्वाभाविक है। हिंदू परंपराएं , मान्यताएं, पर्व एवं व्रत सभी वैज्ञानिक आधार एवं सूर्य व चंद्रमा दोनों की आकाशीय गति से जुड़े हुए हैं। इसीलिए ज्योतिषीय गणना का इन त्योहारों में विशेष महत्व रहता है। पर्वो की तिथियां , दिन व समय हर साल समान नहीं मिलेंगे। नवरात्र से शरीर में नवजीवन का प्रवाह होता है। विशेष आयोजन - उपवास , पूजापाठ, धार्मिक अनुष्ठान, गरबा जैसे नृत्य समारोह आदि शारीरिक ऊर्जा एवं सफूर्ति प्रदान करते हैं। ऋतु परिवर्तन से जुड़े नवरात्र और इसके व्रत की अनुशंसा आयुर्वेद भी करता है।
नवरात्र इन सभी तथ्यों का संधिकाल है। इसी लिए वर्ष में 4 नवरात्र माने गए हैं जो 3-3 महीनों के अंतराल पर आते हैं। आश्विन तथा चैत्र नवरात्रों के अलावा आशाढ़ व पौष मास में भी नवरात्र होते हैं जिन्हंे गुप्त नवरात्र कहा जाता है। ऋतु परिवर्तन के परिचायक ये चारों नवरात्र ,सूक्ष्म तथा चेतन जगत में आई तरंगों , भौगोलिक हलचलों आदि से मानव जीवन पर पड़ रहे प्रभाव आदि को बड़ी सूक्ष्मता से आकलन कर, मौसम के साथ बदलने का ज्ञान मानव को देते हैं कि किस तरह प्राकृतिक परिवर्तन के साथ साथ शारीरिक परिवर्तन भी किया जा सके और प्रकृति के अनुसार जीवन शैली को बदला जाए। शरीर के नौ द्वारों - मुख, दो नेत्र, दो कान, दो नासिका, दो गुप्तेंद्रिय को नवरात्र के 9 दिनों में संयम, साधना, संकल्प ,व्रत आदि से नियंत्रित किया जाता है।
ज्योतिष व नवरात्र
ज्योतिषीय एवं धार्मिक दृष्टि से भी इस पर्व को शुभ माना जाता है और श्राद्ध पक्ष में वर्जित कार्यक्लापों जैसे विवाह, सगाई, नया व्यवसाय, वाहन क्रय, भवन निर्माण, चुनावों का नामांकन भरना इत्यादि जैसे कृत्य नवरात्र लगते ही आरंभ कर दिए जाते हैं।

आइए देखते हैं अक्टूबर महीने के किस दिन कौन कौन से व्रत . त्योहार रहेंगे।

5 अक्टूबर . इंदिरा एकादशी, शुक्रवार व्रत
6 अक्टूबर . शनि प्रदोष व्रत
7 अक्टूबर . मासिक शिवरात्री
8 अक्टूबर . सर्वपितृ अमावस्या
10 अक्टूबर . शारदीय नवरात्रि शुरु ;घट स्थापना ,राजा अग्रसेन जयंती
12 अक्टूबर . विनायक चतुर्थी
16 अक्टूबर . कालरात्रि पूजा
17 अक्टूबर . दुर्गाष्टमी पूजा
18 अक्टूबर . दुर्गा नवमी पूजा, नवरात्रि समाप्ति
19 अक्टूबर . दशहराए विजया दशमी
20 अक्टूबर . पापांकुशा एकादशी
22 अक्टूबर . प्रदोष व्रत
23 अक्टूबर . शरद पूर्णिमा
24 अक्टूबर . वाल्मीकि जयंती,मीरा बाई जयंती
25 अक्टूबर . कार्तिक माह आरम्भ
27 अक्टूबर . करवा चौथ
31 अक्टूबर . अहोई अष्टमी

जौ या खेतरी बीजना

· मदन गुप्ता सपाटू ज्योतिर्विद्                           आदि शक्ति की आराधना के लिए नवरात्रि के 9 दिन बहुत खास होते हैं। नवरात्रि पर मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधिवत पूजा होती है। नवरात्रि के समय जो लोग नवरात्रि व्रत और दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं वे लोग अपने घरों में कलश स्थापना के साथ खेत्री भी बोते हैं। कलश स्थापना अौर जौ बोने के पीछे एक विश्वास है कि इससे आने वाला साल कैसा रहेगा इसका पता लग जाता है। जौ नौ दिनों में बड़ी तेजी से बढ़ते हैं और इसकी हरियाली परिवार में धन धन्य, सुख समृद्धि का प्रतीक है ताकि संपूर्ण वर्ष हमारा जीवन हरा भरा रहे।

·                                     

·                                    हमारे धर्मग्रन्थों के अनुसार ऐसा माना जाता है जब सृष्टि की शुरूआत हुई थी तो पहली फसल जौ ही थी। यही कारण है जब भी किसी देवी-देवताओं की पूजा की जाती है तो हवन में जौ का इस्तेमाल किया जाता है।

·                                    ऐसी मान्यता है कि नवरात्रि पर जो जौ उगाई जाती है वह भविष्य से संबंधित कुछ बातों के संकेत हमे प्राप्त होते हैं। साधारण तौर पर 2-3 दिनो में बोया गया जौ अंकुरित हो जाता हैलेकिन अगर यह न उगे तो भविष्य में आपके लिए अच्छे संकेत नहीं है यानि कि आपको कड़ी मेहनत करने के बाद ही फल की प्राप्ति होगी।                                

·                                    अगर उगने वाला जौ का रंग नीचे से आधा पीला और ऊपर से आधा हरा हो इसका मतलब आने वाले साल का आधा समय ठीक रहेगा।

·                                    अगर वहीं जौ का रंग नीचे से आधा हरा है और ऊपर से आधा पीला हो तो इसका अर्थ है कि आपका साल का शुरूआती समय अच्छे से बीतेगालेकिन बाद में आपको परेशानियों का सामना करना पड़ेगा।

·                                    अगर आपके द्वारा बोया हुआ जौ सफेद या हरे रंग में उग रहा है तो यह बहुत ही शुभ माना जाता है। अगर ऐसा होता है तो यह मान लिया जाता है कि पूजा सफल हो गयी। आने वाला पूरा साल खुशियों से भरा होगा

वैसे तो या दिन में ही जौ से अंकुर निकल आते हैं लेकिन खेत्री देर से निकले तो इसका अर्थ होता है कि देवी संकेत दे रही है कि आने वाले वर्ष में अधिक मेहनत करनी पड़ेगी। मेहनत करने पर उसका फल देर से प्राप्त होगा।
खेत्री का रंग नीचे से पीला अौर ऊपर से हरा हो तो इसका अर्थ होता है कि वर्ष के महीने व्यक्ति के लिए ठीक नहीं है परंतु बाद में सब कुशल मंगल होगा।

 खेत्री का रंग नीचे से हरा अौर ऊपर से पीला होने पर संकेत होता है कि वर्ष की शुरुआत अच्छी होगी लेकिन बाद में उलझन अौर परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
 
खेत्री का श्वेत या हरे रंग में उगना बहुत ही शुभ संकेत होता है। ऐसा होने पर माना जाता है कि पूजा सफल हो गई है। आने वाला पूरा वर्ष खुशहाल अौर सुख-समृद्धि वाला होगा।

संकट से मुक्ति के उपाय
 
खेत्री के अशुभ संकेत होने पर मां दुर्गा से कष्टों को दूर करने के लिए प्रार्थना करें अौर दसवीं तिथि को नवग्रह के नाम से 108 बार हवन में आहुती दें। उसके पश्चात मां के बीज मंत्र

 ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमः  

स्वाहा का 1008 बार जाप करते हुए हवन करें। हवन के बाद मां की आरती करें अौर हवन की भभूत से प्रतिदिन तिलक करें।

रोग की भविष्यवाणी होने पर प्रतिदिन नीचे लिखे मंत्र का जप करें।

यदि इन सबके लिए समय न हो तो नित्य कवचकीलकअर्गला और सिद्घ कुंजिका स्तोत्र का पाठ करने से भी नवग्रहों की कृपा बनी रहती है अौर व्यक्ति को कष्टों से मुक्ति मिलती है।

जौ जीवन में सुख और शांति का प्रतीक होते हैं क्योंकि देवियों के नौ रूपों में एक मां अन्नपूर्णा का रूप भी होता है। जौ की खेत्री का हरा-भरा होना इस बात का प्रतीक है कि जीवन भी हरा-भरा रहे और साथ ही देवी की कृपा भी बनी रहे।

विसर्जन करने से पहले माता जी के स्वरूप तथा जवारों का विधिपूर्वक पूजन करें। विधि विधान से पूजन किए जानें से अधिक मां दुर्गा भावों से पूजन किए जाने पर अधिक प्रसन्न होती हैं। अगर आप मंत्रों से अनजान हैं तो केवल पूजन करते समय दुर्गा सप्तशती में दिए गए नवार्ण मंत्र

  'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे'

 से समस्त पूजन सामग्री अर्पित करें। मां शक्ति का यह मंत्र समर्थ है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूजन सामग्री लाएं और प्रेम भाव से पूजन करें। संभव हो तो श्रृंगार का सामाननारियल और चुनरी अवश्य अर्पित करें।

 पूजन समाप्ति के उपरांत अंजली में चावल एवं पुष्प लेकर जवारे का पूजन निम्न मंत्र के साथ करें-

 गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठे स्वस्थानं परमेश्वरि।

पूजाराधनकाले च पुनरागमनाय च।।

 अब खेतरी का विसर्जन कर देंनवरात्र के नौ दिनों में खेत्री में समाई नवदुर्गा की शक्ति और आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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