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संपादकीय
वसंत पंचमी इतिहास के झरोखों से

जैसे ही वसंत आता है, उपकार फिल्म का प्रसिद्ध गीत -‘पीली पीली सरसों फूली, पीली उड़े पतंग, अरे पीली पीली उड़े चुनरिया, पीली पगड़ी के संग’, भी खेतों का दृश्य लेकर मन मस्तिष्क में तैरने लगता है।

किसान त्रस्त - सरकारें मस्त

यह कैसा लोकतंत्र है? मतदाता 'राजा' होकर भी भिखारी बन गया और प्रतिनिधि नौकर होकर भी राजे बन बैठे। खून-पसीना एक करके जिस बंजर भूमि को अनाज उगाने लायक बनाया, भला उसको पूंजीपतियों के हाथ में कैसे सौंप दें? बस इतनी- सी बात भी हमारे नेताओं की समझ में नहीं आ रही।

किसान त्रस्त - सरकारें मस्त

यह कैसा लोकतंत्र है? मतदाता 'राजा' होकर भी भिखारी बन गया और प्रतिनिधि नौकर होकर भी राजे बन बैठे। खून-पसीना एक करके जिस बंजर भूमि को अनाज उगाने लायक बनाया, भला उसको पूंजीपतियों के हाथ में कैसे सौंप दें? बस इतनी- सी बात भी हमारे नेताओं की समझ में नहीं आ रही।

सरकारों को क्यों सुनाई नहीं देता धरतीपुत्र का आर्तनाद

सर्द रातों में खेतों को पानी देना आसान काम नहीं है। इस सारी मशक्कत में धरतीपुत्र कब बीमार होता है, कब मर जाता है, इतना सोचने का समय भी उनके पास नहीं होता। अब सवाल उठता है कि मिट्टी के साथ मिट्टी होने वाला यह इंसान क्या सम्मान भरी जिंदगी का हकदार नहीं?

मौत में अपना अस्तित्व तलाशता मीडिया

आजकल जब टी वी ऑन करते ही देश का लगभग हर चैनल "सुशांत केस में नया खुलासा" या फिर "सबसे बडी कवरेज" नाम के कार्यक्रम दिन भर चलाता है तो किसी शायर के ये शब्द याद आ जाते हैं, "लहू को ही खाकर जिए जा रहे हैं, है खून या कि पानी,पिए जा रहे हैं।"

सुशांत राजपूत की मौत का रहस्य— हत्या या आत्महत्या?

अटल सच्चाई यह है कि कोई मरना नहीं चाहता। जब तक कि उसके जीने के सारे रास्ते बंद ना हो जाएं। मुसीबतों से घिर जाने पर बहुत से लोग आत्महत्या के बारे में सोचते हैं किंतु उस अंधेरे में जैसे ही उन्हें प्रकाश या कहें कि आशा की एक किरण दिखाई देती है तो मरने का विचार पल भर में उड़न छू हो जाता है।

विकास दुबे एनकाउंटर— जरूरी या मजबूरी

नि:संदेह भारतीय न्याय व्यवस्था में अनेकों झोल हैं जिस का सहारा लेकर अपराधी व्यक्ति अक्सर कानून के हाथ से बच जाता है। किंतु उस न्याय व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पाया पुलिस तंत्र ही है।

मां भारती सुशांत राजपूत की मौत का रहस्य— हत्या या आत्महत्या? हमारे जीवन, जीवनशैली और रोज़गार से कम-से-कम संसाधनों का दोहन हो विकास दुबे एनकाउंटर— जरूरी या मजबूरी बिहार रेजीमेंट के शूरवीरों ने कैसे चीनियों की पिटाई, बौनों को बौनी क्षमता का करवाया अहसास जंगल के नियम बनाम इंसाफ का तकाजा अच्छे दिन बनाम भुखमरी कोरोना या कादर का कहिर क्या सुप्रीम कोर्ट सिर्फ रसूखदारों की सुनती है आम जनता की नहीं? इरफान के विवेक_की पराकाष्ठा को परख गई प्रकृति प्राकृतिक सम्पदा संभालने का सुनहरा अवसर लॉक डाउन में प्रीपेड मोबाइल को वैलिडिटी एक्सटेंशन का लाभ डी टी एच उपभोक्ता को क्यो नहीं श्रापित दुनिया की ठेकेदार पांच महाशक्तियां सवालों के घेरे में पुत्रमोह मे फँसे भारतीय राजनेता एवं राजनीति, गर्त मे भी जाने को तैयार पवित्रता की याद दिलाती है ‘राखी’ करीब 50 गाँव के बीच में एक आधार केंद्र परबत्ता, 2-3 चक्कर से पहले पूरा नहीं होता कोई काम अपने हृदय सम्राट, पुण्यात्मा, समाज सुधारक स्व: सीताराम जी बागला की पुण्यतिथि पर नतमस्तक हुए क्षेत्रवासी क्या चुनावों में हर बार होती है जनता के साथ ठग्गी? क्या देश का चौकीदार सचमुच में चोर है? रोड़ रेज की बढ़ती घटनाएं चिंताजनक नवजोत सिद्धू की गांधीगिरी ने दिया सिखों को तोहफा: गुरु नानक के प्रकाशोत्सव पर मोदी सरकार का बड़ा फैसला, करतारपुर कॉरिडोर को मंजूरी भीड़ भाड़ वाले बाजारों से दूर लगने चाहिए पटाखों के स्टाल दश—हरा: पहले राम बनो— तब मुझे जलाने का दंभ भरो हिंदुस्तान को वर्तमान का प्रजातंत्र नहीं बल्कि सही मायनों में लोकशाही या तानाशाह की जरूरत भारत बंद बुद्धि बंद का परिचय ईवीएम में गड़बड़ी या मात्र विरोध नीति? कानून की आड़ में अपराध आखिर कब तक? कल्पेश याज्ञनिकः एक और बलि आरसएस को राष्ट्रीयता का पाठ