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संपादकीय

दुनिया की ठेकेदार पांच महाशक्तियां सवालों के घेरे में

April 06, 2020 11:11 PM

डॉ. मंजू डगर

  विश्व की ठेकेदार पांच महाशक्तियों की दुनिया के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी भी है और किसी भी वैश्विक आपदा में एक दूसरे का सहयोग करने की भागीदारी भी। लेकिन यहाँ तो कुछ और ही दिखाई दे रहा है। जहाँ से ये महामारी चली वहां सब फिर से सामान्य होने लगा और पूरा विश्व अभी भी इस संकट से निकलने की जद्दोज़हद में लगा है

हालांकि चिरपरिचित अमरीका और रूस ने हाथ मिला लिया है इसके खिलाफ एकजुट हो कर लड़ने का तभी तो रूस ने अमरीका को सहायता करने की पहल की। कोरोना वॉयरस कोई मजाक नहीं हो रहा। इस महामारी से पूरी दुनिया अपनी ताकत लगा कर लड़ रही है लेकिन लगता है फतह से अभी भी सभी कोसों दूर हैं।

मैंने पहले भी लिखा है कि ये एक बायोलॉजिकल वेपन था जिसका प्रयोग उन्होंने बहुत समझदारी से किया और किसी ने कोई सवाल भी नहीं उठाये लेकिन अमरीका ये हक़ीक़त जानता है वो वक़्त आने पर इसका खुलासा ज़रूर करेगा। अभी हाल ही में ब्रिटेन सरकार को भी खुफिया सूचना मिली है कि वायरस का संक्रमण पहले चीनी लैब से जानवरों में हुआ और उसके बाद वह इंसानों में फैला, जोकि अब घातक रूप ले चुका है।

आप देखिये कोबरा को सिक्यॉरिटी सर्विस ने इस संबंध में डिटेल जानकारी दी है। उसने कहा वायरस की प्रकृति को लेकर एक विश्वसनीय विचार हैं। यह महज संयोग नहीं है कि वुहान में लैब मौजूद हैं। इस तथ्य को छोड़ा नहीं जा सकता। वुहान में इंस्टिट्यूट ऑफ वायरोलॉजी मौजूद है। चीन में यह सबसे ऐडवांस लैब है। यह इंस्टिट्यूट जानवरों के बाजार से महज 10 मील दूर स्थित है।

आप खुद भी सोचिये कि इस वॉयरस से हुई लाशों पर कोई गर्व करना चाहेंगे ?? कभी भी नहीं। यहाँ मैं आप को बताती चलूं कि जैविक युद्ध अथवा कीटाणु युद्ध में किसी व्यक्ति, पशु अथवा पौधे को मारने के उद्देश्य से उसके उसमें जीवाणु, विषाणु जैसे जैविक संक्रमित तत्वों का उपयोग किया जाता है। कई अंतर्राष्ट्रीय सन्धियों द्वारा जैविक हथियारों का प्रयोग प्रतिबन्धित है। क्योंकि सशस्त्र-संघर्ष के दौरान जैविक हथियारों का इस्तेमाल युद्ध-अपराध की श्रेणी में ही लिया जाता है। कहीं कुछ तो है जिसकी पर्दादारी ये महाशक्तियां कर रहीं हैं।

आप खुद भी सोचिये कि इस वॉयरस से हुई लाशों पर कोई गर्व करना चाहेंगे ?? कभी भी नहीं। यहाँ मैं आप को बताती चलूं कि जैविक युद्ध अथवा कीटाणु युद्ध में किसी व्यक्ति, पशु अथवा पौधे को मारने के उद्देश्य से उसके उसमें जीवाणु, विषाणु जैसे जैविक संक्रमित तत्वों का उपयोग किया जाता है। कई अंतर्राष्ट्रीय सन्धियों द्वारा जैविक हथियारों का प्रयोग प्रतिबन्धित है। क्योंकि सशस्त्र-संघर्ष के दौरान जैविक हथियारों का इस्तेमाल युद्ध-अपराध की श्रेणी में ही लिया जाता है। कहीं कुछ तो है जिसकी पर्दादारी ये महाशक्तियां कर रहीं हैं।

कोरोना वॉयरस जिसकी रोकथाम के लिए दुनिया के किसी कोने में कोई दवाई भी मौजूद नहीं उसका इस्तेमाल करके पूरी दुनिया में तबाही मचाना ठीक वैसा ही है जैसे कुंठित दिमाग सब कुछ खत्म कर देना चाहता हो। मैं तो ये कहूँगी कि ये पूरी तरह से मानवता की हत्या है। आप इसको एक थॉयरी समझ कर नकार भी सकते हैं। लेकिन फिर भी आप सोचिये कोरोना वॉयरस से ठीक पहले मानवाधिकारों के हनन को लेकर चीन के खिलाफ पूरी दुनिया में एक माहौल सा बनता जा रहा था। कभी हॉगकॉग को लेकर कभी उइगर मुस्लिम को लेकर कभी आतंकवाद के नाम पर बार -बार अपनी वीटो पॉवर के इस्तेमाल करने को लेकर।

ऐसा तो नहीं होता ना की पांच महाशक्तियों में शुमार चीन ने कभी कोई गलती न की हो। बाकि महाशक्तियां भी गलतियां करती रही हैं। अमरीका भी गल्तियां करता रहा है। अभी हाल ही की उनकी तालिबान समझौता भी बहुत बड़ी गलती है जिसका ख़ामियाजा हमको उसी दिन से नज़र आने लगा था जिस दिन डील हुई थी। रूस ने भी गल्तियां की थीं जिसका खामियाजा उसको ग्यारह टुकड़ों के रूप में चुकाना पड़ा था। लेकिन रूस अपनी उन्हीं गल्तियों से सीख भी रहा है। लेकिन दूसरी तरफ किसी भी महाशक्ति ने अभी तक ऐसी गलती नहीं कि जिसका खामियाजा पूरी मानवता को चुकाना पड़ रहा हो वो भी बिना किसी कसूर के।

आप खुद ही सोचिये बीमारी का आरम्भ जहाँ से हुआ हो वहाँ केवल नुकसान 3500 के आसपास और हज़ारों मील दूर 10,000 लाशों तक का आंकड़ा पार। ऐसी संभावना तो तब ही हो सकती है जब या तो दुनिया को सही आंकड़ा नहीं बताया गया या फिर आप के पास इसका ईलाज़ मौजूद है लेकिन आप दुनिया से साँझा नहीं करना चाहते। फिर आप के अंदर मानवता कैसे आ सकती है। जोकि सिर्फ़ अपने सुख की ही सोचे। तब तो बड़ा सवाल उठाता है कि आप महाशक्ति बने रहने के क़ाबिल हैं भी या नहीं क्योंकि अपने फ़ायदे के लिए आप कब पूरी दुनिया को तबाही के मुहाने पर खड़ा कर देंगे ये बात कोई नहीं जानता।

2004 में भी चीनी लैब से हुई लीक के कारण घातक सार्स वायरस फैला था, उसके परिणाम भी काफी मुल्कों ने झेला था। चीनी सरकार ने तब कहा था कि लापरवाही के कारण ऐसा हुआ था और उसने अपने 5 वरिष्ठ अधिकारियों को दंडित भी किया था। तब भी किसी भी महाशक्ति ने उनसे सवाल क्यों नहीं किया ?? यहाँ आप का ध्यान इस तरफ भी दिलाना चाहूंगी कि चीनी अखबार पीपल्स डेली ने 2018 में कहा था कि चीन घातक इबोला वायरस जैसे माइक्रोऑर्गेनिजम पर प्रयोग करने में भी समक्ष है। अब आप खुद ही सोचिये इबोला हो , सार्स हुआ और अब कोरोना सब के तार तो एक ही जगह से जुड़ते हैं। क्या ये महज़ इतफ़ाक़ हो सकता हैं ?? मुझको ऐसा कतई नहीं लगता।

यहाँ पर भी बाकि महाशक्तियों को यक़ीनन चीन से सवाल करना चाहिए था या कम से कम जानकारी आपस में तो जरूर साँझा करनी चाहिए थी लेकिन नहीं की गई क्योंकि दुनिया पर फतह करने की इन सभी महाशक्तियों की अपनी -अपनी अलग -अलग महत्वकांशा भी है। अमरीका , रूस और चीन इस रेस में बराबर दौड़ने की कोशिश में लगे हुए हैं। किसी अन्य देश के आंतरिक मामलों में भागीदारी की पेशकश ले कर तो अमरीका तुरंत पहुंच जाता है लेकिन चीन से सीधा - सीधा संवाद भी नहीं करता जबकि उसके पास इन सब के खिलाफ पुख़्ता सबूत मौजूद हैं।

आप खुद ही सोचिये चीन में बने सामानों की गुणवत्‍ता को लेकर भी अक्‍सर दुनियाभर में सवाल उठते रहते हैं। कोरोना महासंकट के बीच इसका एक और उदाहरण स्‍पेन में भी देखने को मिला था। इस महामारी की विनाशलीला झेल रहे स्‍पेन ने कोरोना वायरस की तेजी से जांच के लिए चीन से जांच किट खरीदे लेकिन वे कोरोना पॉजिटिव मरीजों को डिटेक्‍ट ही नहीं कर पा रहे हैं। निम्न स्तर की चीनी जांच किटों ने ऐसे समय पर स्‍पेन को धोखा दिया है जब यह यूरोपीय देश दुनिया में सबसे ज्‍यादा कोरोना वायरस से प्रभावित है। एक और उद्धरण लीजिये कोरोना वायरस से न‍िपटने के ल‍िए नीदरलैंड सरकार का चीन से मास्‍क मंगाने का फैसला भी खुद उसी पर भारी पड़ गया ।

चीन ने नीदरलैंड को 6 लाख मास्‍क भेजे जोकि सभी बेकार न‍िकले। और तो छोड़िये अपने सदाबहार दोस्त पाकिस्तान को भी चीन ने धोखा दिया। कोरोना वायरस से निपटने के लिए चीन ने पाकिस्तान को मेडिकल सप्लाई भेजने की पेशकश की थी। पाकिस्तान ने यह पेशकश खुशी-खुशी स्वीकार भी कर ली, लेकिन जब मेडिकल सप्लाई पहुँची तो पाकिस्तान के होश उड़ गए क्योंकि जब चीन से आए सामानों को खोलकर देखा गया तो पता चला कि एन-95 मास्क की जगह अंडरवेयर से बने मास्क पाकिस्तान को पकड़ा दिए गए हैं। क्या इस तरह की हरकतें एक महाशक्ति से उम्मीद की जा सकती हैं ?? कोई सवाल भी नहीं पूछ रहा क्यों ??

क्या ये पूरी दुनिया की ठेकेदार बनी महाशक्तियों की समूहिक जिम्मेदारी नहीं बनती की वो चीन से सवाल करें की कि इस वैश्विक महामारी में वो ये लापरवाहियाँ गलती से कर रहा हैं याकि जानबुझ कर। क्या लोगों की जिंदगी इतनी सस्ती है की गलत सामान आ गया आप रुकिए हम बदलवा कर लाते हैं। बस चीन से छोटी सी गलती हो गई। दूसरी तरफ चीन ने अपने सभी लॉक डाउन भी खोल दिये और मजे की बात देखिये उनकी एक पर्वतारोही टीम माउंट एवरेस्ट को फतह करने भी निकल चुकी। क्या ये कुछ ऐसा सामान्य सा है कि एक गली के किनारे से दूसरे किनारे तक जाना ??

नहीं ऐसा तभी हो सकता है जब वहां सब सामान्य सा हो गया हो। मेरा सब से अहम् सवाल है विश्व की पाँचो महाशक्तियों से की भले ही आप अपनी -अपनी महत्वकांक्षाओ की उड़ान पर उड़ते रहिये लेकिन धरती के बाकी देशों के प्रति भी आप की जिम्मेदारी सामुहिक ही बनती है और इस महामारी में तो आप की जिम्मेदारी भी मानवता के प्रति और अधिक गहरी बनती है। उम्मीद करती हूँ वो सभी अपनी जिम्मेदारी की अहमियत को देखते हुए दुनिया के भविष्य का रास्ता प्रकाशित करेंगे।
डॉ.मंजू डगर, जानी मानी अंतरराष्ट्रीय पत्रकार हैं

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