Friday, 25 September 2026
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भुखमरी के कगार पर रहने वालों को मुफ्त सहायता दी जानी चाहिये

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(MOREPIC1)पालमपुर, (विजयेन्दर शर्मा)

हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शान्ता कुमार ने कहा कि भारतीय राजनीती में मुफ्त रेबड़ियां वांटने के प्रश्न पर एक गंभीर बहस हो रही है। मामला देश के उच्चतम न्यायालय तक भी पहुॅच गया है। भारत में वर्षो पहले गंभीरता से बिचार करके ठीक निर्णय कर लिया गया था। उसकी दृश्टि में यह बहस बिल्कुल व्यर्थ है।
उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानन्द जी देश के गरीबों के लिये खून के आंसू बहाते रहे। उन्होंने दरिद्र नारायण का मंत्र दिया। महात्मा गांधी जी ने उसी आधार पर अन्त्योदय का मंत्र दिया। दीन दयाल उपाध्याय जी ने पंक्ति में सबसे पीछे के व्यक्ति की मदद का मंत्र दिया। इन्हीं मंत्रों के आधार पर 1977 में जनता सरकारों ने अन्त्योदय योजनायें शुरू की।
शान्ता कुमार ने कहा कि हिमाचल और राजस्थान में एक साथ अन्त्योदय योजना आरम्भ की गई थी। हिमाचल में एक लाख सबसे गरीब परिवारों को चुन कर लोक कल्याण की सभी योजनाओं को प्राथमिकता के आधार पर उन परिवारों की ओर केन्द्रित किया गया था। कुछ और सुविधायें भी दी गई थी। एक वर्ष के बाद 40 प्रतिशत परिवार गरीबी की रेखा से ऊपर हो गये थे ।
उन्होने कहा कि श्री अटल जी के नेतृत्व में किसी को मुफ्त अनाज वांटने की बात नहीं सोची गई। सबसे गरीब 10 करोड़ लोगों को चुनकर अन्त्योदय अन्न योजना शुरू हुई। मुफत आनाज नहीं वल्कि सस्ते भाव पर 35 किलो आनाज 2 रूपये किलो गेहॅू और 3 रूपये किलो चावल देना शुरू किया। कुछ समय बाद सरकार के सामने एक विषय आया। कुछ लोग इतने अधिक गरीब हैं कि 2 और 3 रूपये के भाव पर भी राशन नहीं खरीद सकते। तब अटल जी से सलाह करके अन्नपूर्णा योजना शुरू की। भुखमरी के कगार पर जी रहे अति गरीब परिवारों को 20 किलो आनाज मुफ्त दिया जाने लगा।
शान्ता कुमार ने कहा कि देश के मनीषियों और प्रमुख नेताओं द्वारा सिद्धांत तय है कि भुखमरी के कगार पर रहने वालों को मुफ्त सहायता दी जानी चाहिये। अति गरीब लोगों को मुफत नहीं सस्ते भाव पर आवष्यक वस्तुयें दी जायें और अन्य सभी लोगों को कुछ भी मुफ्त नहीं दिया जाए। अच्छे भले सम्पन्न लोगों को मुफ्त वस्तुयें देकर भिखमंगा बनाने का प्रयत्न एक महा पाप है – उनके स्वाभिमान के साथ खिलवाड़ है और आत्म निर्भरता के विपरीत एक कदम है। सरकार के आर्थिक तंत्र की बरवादी है। देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह कि राजनीती देश के लिए नहीं- केवल और केवल कुर्सी के लिए है।