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संपादकीय

रोड़ रेज की बढ़ती घटनाएं चिंताजनक

December 18, 2018 06:08 PM

जे स कलेर 

बीच चौराहों पर रोड़रोज की घटनाएं ना केवल चिंतनीय हैं बल्कि आज के युवाओं की मानसिकता व गिरती संवेदनशीलता को भी दर्शाती हैं। जरा सी बात पर एक दूसरे पर हमला कर देना आम होता जा रहा है। आखिर यह सब हो क्या रहा है? क्या किसी की जान की कोई कीमत ही नहीं है? सवाल यह है कि आखिर आज का युवा छोटी सी बात पर ही इतना भड़क क्यो जाता है? गुस्से में उसे आगे−पीछे का भी ध्यान नहीं रहता और सामने वाले की जान लेने तक आमादा हो जाना सवाल उठाता है कि आज की युवा पीढ़ी आखिर जा कहां रही है?

गाड़ी को साइड़ नहीं देने, मामूली-सा टच हो जाने, सड़क पर जाम लगे होने के कारण आगे वाले द्वारा गाड़ी को जल्दी नहीं निकालने, गाड़ी आगे कैसे चल रही है, हॉर्न कैसे बजा दिया, जल्दी जाने का तनाव और ऐसे छोटे−छोटे कारणों से आज के युवा पर गुस्सा इस कदर हावी हो जाता है कि बात लड़ाई−झगड़े, गाली−गलौच तक ही सीमित नहीं रहती बल्की गुस्से में टक्कर मारने, हाथा−पाई करने, जान लेवा हमला करने तक बढ़ने लगी है। दूसरे की जान तक ले लेना आम होता जा रहा है।

हालात यह हो गए हैं कि देश में होने वाले कुल सड़क हादसों में 60 फीसदी घटनाए रोड रेज के कारण होती हैं। यह कोई छोटा−मोटा आंकड़ा नहीं है और ना ही यह केवल हमारे देश की समस्या है, पर जिस तरह से रोडरेज की घटनाएं बढ़ रही हैं वह बेहद चिंतनीय है।

देश में होने वाले कुल सड़क हादसों में 60 फीसदी घटनाए रोड रेज के कारण होती हैं। यह कोई छोटा−मोटा आंकड़ा नहीं है और ना ही यह केवल हमारे देश की समस्या है, पर जिस तरह से रोडरेज की घटनाएं बढ़ रही हैं वह बेहद चिंतनीय है।

वैसे तो देश−विदेश के हर कोने में रोडरेज की घटनाएं हो रही हैं। इस शब्द का ईजाद भी मीडिया ने ही किया है। 1980 के दशक में यूएसए के टीवी चैनलों ने सबसे पहले इस शब्द का प्रयोग शुरू किया। रोड रेज का सीधा सीधा अर्थ सड़क पर आक्रोशित होकर वाहन चालक द्वारा आक्रामक व्यवहार करना या अनावश्यक रूप से गुस्से का इजहार करना है। वाहन को असामान्य तरीके से चलाना, एकाएक ब्रेक लगाना, दूसरे वाहन के पीछे झटके से गाड़ी को रोकना, असामान्य तरीके से हॉर्न बजाना, अनावश्यक रूप से आगे जाने की होड़, दूसरे के वाहन को टच करना, तेज रोशनी कर गाड़ी चलाना, सड़क पर स्टंट करना या इसी तरह की गतिविधियां करते हुए सामने वाले से लड़ने को तत्पर रहना रोड रेज की श्रेणी में आता है।

दिल्ली सहित महानगरों में तो इस तरह की घटनाएं आम होती जा रही हैं। एक मोटे अनुमान के अनुसार सड़क हादसों में 60 प्रतिशत घटनाएं रोडरेज के कारण होती हैं। 42 फीसदी मामलों में दो वाहनों के चालक छोटी सी बात पर आपस में भिड़ जाते हैं। 33 फीसदी मामलों में कार चालक दुपहिया चालक से लड़ने पर आमादा हो जाते हैं। यह भी सही है कि रोड रेज के 70 फीसदी मामले तो दर्ज ही नहीं होते। लड़ते−झगड़ते वाहन चालकों को उनका गुबार निकालने के बाद आपसी समझाइश से उस जगह से रवाना कर दिया जाता है। यह दूसरी बात है कि जाते−जाते भी एक दूसरे को देख लेने की धमकी देना नहीं भूलते।

एक विख्यात शोधकर्ता द्वारा कराए गए एक सर्वे में यह भी सामने आया है कि वाहन चलाते समय युवाओं में गुस्से की मात्रा अधिक हो जाती है। यही नहीं सड़क पर यातायात जाम होने, बेतरतीब यातायात, गाड़ी चलाते समय मोबाइल पर कॉल आना, खराब सड़कें, बार बार लाल बत्ती से सामना, तेज हॉर्न, गलत तरीके से पार्किंग, काम का दबाव, समय पर पहुंचने का दबाव व निजी कारणों से व्यक्ति तनाव में आ जाता है और यह रोड रेज का कारण बन जाता है। इन सबसे परे पैसे और सत्ता का मद भी ऐसा है जो युवाओं को रोड रेज के लिए प्रेरित करता है। रोड रेज के अधिकांश मामले जो सामने आते हैं या जिनके कारण रोड रेज मीडिया में प्रमुखता पाता है वह सत्ता या पैसे के मद में किए जाने वाले प्रकरण ही होते हैं।

रोड रेज की समस्या के प्रति सरकार के गंभीर होने के बावजूद इस पर अंकुश लगाने का कानून अभी धरातल पर नहीं आ पाया है। 2014 से यह कानून विचाराधीन चल रहा है। इस कानून में सड़क चलते अपराध करने की स्थिति में तीन लाख रुपए तक जुर्माना और सात साल की सजा का प्रावधान प्रस्तावित है। आज की तारीख में लोगों को कानून का डर नहीं है। पहली बात तो ले देकर या सिफारिश से मामले रफा−दफा हो जाते हैं। यदि ऐसा नहीं भी हो तो अधिकतर यातायात नियमों के उल्लंघन पर जुर्माना लगाकर इतिश्री हो जाती है। इसके अलावा न्यायिक प्रक्रिया इतनी लंबी चलती है कि वर्षों तक फैसला नहीं हो पाता। अपील दर अपील का सिलसिला भी दोषियों को बचाने में सहायक होता है। रोड रेज की आए दिन व बढ़ती घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए सरकार को सख्त कानूनी प्रावधान करने के साथ ही यातायात नियमों की पालना भी सख्ती से कराने पर ध्यान देना होगा, नहीं तो यह सिलसिला थमने वाला नहीं लगता है। हालांकि सरकार ने यातायात नियमों की पालना में सख्ती की दिशा में कदम बढ़ाए हैं पर जब तक इनकी सख्ती से पालना नहीं होती तब तक यह सब बेमानी है। वैसे भी आज के युवाओं की सहनशीलता और संवेदनशीलता जगजाहिर है। ऐसे में रोड रेज की घटनाओं पर कारगर रोक लगाया जाना आज की आवश्यकता है।

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