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संपादकीय

जयं​ती पर विशेष: महान स्वतंत्रता सेनानी एवं गांधीवादी नेता बाबू मूलचन्द जैन

August 20, 2015 06:53 PM

हरियाणा के गांधी कहे जाने वाले प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी बाबू मूलचन्द जैन किसी भी बड़े से बड़े समाज की परवाह किये बगैर समाज में निचले स्तर का जीवन ज्ञापन करने वाले लोगों की सेवा को ही अपना धर्म मानते थे। स्वतंत्रता सेनानी बाबू मूलचन्द जैन आरम्भ से ही क्रांतिकारी विचारों के थे। गांधी जी के विचारों का व जैन धर्म ग्रन्थों का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव था। उन्हें छुआछूत से भारी नफरत ही नहीं थी बल्कि छुआछुत करने वाले व्यक्तियों से वे दूर रहना पसन्द करते थे। यही कारण था कि कॉलेज षिक्षा के दौरान ही उन्होंने महसूस किया कि गांव के उच्च वर्ग द्वारा दलितों को उच्च वर्ग के कुएं से पानी न भरने देना दलितों के साथ अन्याय है, तो बाबू जी का खून खौल उठा और बाबू जी ने गांव के दलितों को उच्च वर्ग के कुएं से पानी भरने के लिए प्रेरित ही नही किया बल्कि उच्च वर्ग के विरोध के बावजूद कुएं से पानी भरवाकर ही दम लिया। भले ही बाबू जी को उनके इस कार्य से गांव के उच्च वर्ग का विरोध झेलना पड़ा। बाबू मूलचन्द जैन का जन्म 20 अगस्त 1915 को गांव सिकंदरपुर माजरा तहसील गोहाना ;सोनीपत में हुआ था। उनकी कर्मस्थली पूरा राज्य, विषेष रूप करनाल रहा। बाबू जी ने गांव के स्कूल से सन 1925 में प्राथमिक षिक्षा पास की, मैट्र्रिक की परीक्षा सन् 1931 में गोहाना के हाई स्कूल से पास की और प्रथम स्थान प्राप्त किया। उसी वर्ष मार्च में सरदार भगत सिंह, सुखदेव सिंह और राजगुरु को फांसी दी गई। इसके विरोध में सारे देष में कोहराम मच गया। उसी दौरान गोहाना में भी विरोध में जलसे व जुलूस हुए, जिसमें बाबू जी ने बढ़चढ़ कर भाग लिया। 
सन् 1935 में लाहौर से बी.ए. की परीक्षा उतीर्ण की। कॉलेज में बाबू जी अपना खर्च चलाने के लिए टयूषन पढ़ाने का कार्य करते थे। वह विद्यार्थी जीवन में बड़े उदार हृदय के थे। एक बार अपनी फीस माफी के लिए प्रोफेसर के पास गए। किन्तु वहां जब उन्हें पता चला कि उनसे भी गरीब कोई विद्यार्थी है तो उन्होंने अपनी जगह पर उनकी फीस माफ करवा दी। सन 1937 में पंजाब विष्वविद्यालय लाहौर से कानून की परीक्षा पास की। प्रथम आने पर गोल्ड से सम्मानित किया गया। उसके बाद सन् 1937 में गोहाना में वकालत षुरू की और गांधी जी के आहवान पर स्वतन्त्रता आंदोलन में कूद पड़े। सन् 1938 में रोहतक के असौंधा गांव में कांग्रेस की सभा पर जमीदारा लीग के हजारों कार्यकर्ताओ ने हमला बोलकर कांग्रेस के अनेक कार्यकर्ताओं को घायल कर दिया था। जिसमें बाबू जी भी थे। सन् 1941 में गांधी जी ने सत्याग्रह आंदोलन में उन्होंने बढ़चढ़ कर भाग लिया। 6 मार्च 1941 को बाबू जी ने अपनी जन्मभूमि गांव सिकन्दरपुरा माजरा से ही सत्याग्रह ष्षुरू कर दिया तथा प्रमुख स्वतन्त्रता सेनानी चौधरी रणवीर सिंह हुड्डा की उपस्थिति में गिरफतारी दी। इस पर पुलिस ने उन्हें गिरफतार करके जेल में भेज दिया और एक साल की सजा गुजरात ;पाकिस्तान जेल में काटी। सन् 1942 में गांधी जी द्वारा छेड़े गए भारत छोड़ो आंदोलन में बाबू जी के भाग लेने पर 11 अगस्त 1942 को उन्हे करनाल कचहरी में गिरफतार कर लिया और नजरबन्द करके उन्हे पुरानी केन्द्रीय जेल मुलतान ;पाकिस्तान भेज दिया। जहां उन्हे एक साल से अधिक रहना पड़ा।
आजादी के बाद बाबूजी जिला कांग्रेस करनाल के महासचिव व बाद में जिला कांग्रेस के प्रधान बने। वह गरीबों व मुजारों की वकालत मुफत ही किया करते थे उन्होंने एक साप्ताहिक समाचार पत्र बलिदान का भी संपादन किया। वह अपने लेख में मुजारो को 5-5 एकड़ भूमि दिलवाने की बात करते थे।
बाबू जी सन् 1952 में पहली बार समालखा से विधायक बने तथा सरदार प्रताप सिंह कैरो के मंत्रीमण्डल में सन् 1956 में कैबिनेट स्तर के मंत्री बने। सन् 1957 में कैथल से लोकसभा के सदस्य चुने गए। सन् 1962 में घरौण्डा से कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़ा। परन्तु तत्कालीन मुख्यमन्त्री प्रताप सिंह कैरो के अंदरूनी विरोध के कारण चुनाव हार गए। सन् 1965-67 के दौरान बाबू जी ने हरियाणा को पंजाब से अलग प्रांत बनाने के लिए चलाए गए आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया तथा ऑल हरियाणा एक्षन कमेटी के महासचिव बने। उनके तथा हरियाणा के अन्य नेताओं के अथक प्रयासों से हरियाणा एक अलग प्रांत बना। सन् 1967 में घरौण्डा के विधायक बने और राव वीरेन्द्र सिंह, के मंत्रीमण्डल में राज्य के वित्तमन्त्री बने।
सन् 1973-75 के दौरान उन्होंने लोकनायक जय प्रकाष नारायण द्वारा चलाए गए आंदोनल में सक्रिय रूप से भाग लिया और हरियाणा संघर्ष समिति की कार्यकारिणी के सदस्य भी बने। सन् 1975 में आपातकाल के दौरान 19 महीने जेल में रहे। सन् 1977 में समालखा से जनता पार्टी के टिकट पर विधायक बने तथा 1978 में चौधरी देवीलाल , के मंत्रीमण्डल में राज्य के वितमन्त्री बने। सन् 1980-82 के दौरान राज्य में विपक्ष के नेता रहे।
सन् 1985-87 में बाबू जी ने राजीव लोगोंवाल समझौता की धारा 7 व 9 विरोध किया तथा चौधरी देवीलाल द्वारा चलाये गये न्याय युद्ध आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया व इस दौरान जेल भी गये। सन् 1987 में चौधरी देवीलाल की सरकार बनने के बाद बाबू जी योजना बोर्ड के उपाध्यक्ष बने तथा इस दौरान उन्होंने राज्य में षिक्षा के प्रसार के लिए पुस्तकालय आंदोलन व नैतिक षिक्षा पर विषेष बल दिया। उन्होंने जुलाई 1989 मे तत्कालीन मुख्यमंत्री से मतभेदों के कारण योजना बोर्ड के उपाध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया। सन् 1990 की षुरूआत में उन्होंने महम उप चुनाव में पंचायत संघर्ष समिति के उम्मीदवार श्री आनन्द सिंह दांगी का जोरदार समर्थन किया। इसी साल 20 अगस्त 1990 को बाबूजी का 75वा जन्म दिवस हरियाणा की जनता द्वारा करनाल मे एक भव्य जनसभा करके हिरक जंयती समारोह के रूप मे बडी धूम धाम से मनाया गया, जिसमे बाबूजी की राज्य की जनता के प्रति की गई दीर्घकालीन सेवाओ को मध्यनजर रखते हुऐ उन्हे एक अभिनन्दन ग्रथ व कार भेट की गई।
बाबूजी मौजूदा षिक्षा के ढांचे मे मुलभूत रूप से सुधार लाने के इच्छुक थे। षिक्षा के प्रसार के लिये वो नैतिक षिक्षा व पुस्तकाल्य आन्दोलन को एक महत्वपूर्ण तथ्य मानते थे। 1989 मे बाबूजी के बतौर उपअघ्यक्ष राज्य योजना बोर्ड अथक प्रयासो से हरियाणा सरकार ने ष्च्नइसपब स्पइतंतपमे ।बजष् कानून बनाया। 1992-96 के दोरान बाबूजी को सरकार द्वारा अघ्यक्ष ैजंदकपदह ।कअपेवतल ब्वउउपजजमम ;स्पइतंतलद्ध के अघ्यक्ष व सदस्य ैजंजम स्पइतंतल ।नजीवतपजल बनाया गया। बाबूजी ने हरियाणा मे पुस्तकाल्य आन्दोलन को उठाने मे सहरानीय योगदान दिया है । बाबू जी ने अपने 76वें जन्म दिवस के अवसर पर 20 अगस्त 1991 को अपने पैतृक गांव सिकंदरपुरा माजरा में अपने पैतृक निवास को एक आदर्ष पुस्तकालय के रूप में परिवर्तित कर गांव व क्षेत्र के लोगों को समर्पित कर दिया। तभी से हर वर्ष ग्रामवासी बाबू जी जन्म दिवस पुस्तकाल्य दिवस के रूप में मनाते आ रहे है। इस पुस्तकालय दिवस के अवसर पर बाबू जी जीवनकाल मे उसके उपरान्त देष व प्रदेष के अनेक प्रमुख व्यकित व राजनीतिक हस्थतिया व केन्द्रीय मंत्री जिनमें प्रमुख रूप से श्रीमति सुमनकांत धर्मपत्नी श्री कृष्णकांत तत्कालीन उपराष्ट्र्रपति भारत सरकार, चौ0 रणबीर सिंह हुड्डा अध्यक्ष अखिल भारतीय स्वतन्त्रता सेनानी संगठन ,चौ0 बंसी लाल तत्कालीन मुख्यमंत्री हरियाणा, श्री बनारसी दास गुप्ता पूर्व मुख्यमंत्री हरियाणा, श्री आई डी स्वामी तत्कालीन केन्द्रीय राज्य मंत्री , श्री ओम प्रकाष जिन्दल पूर्व सांसद तथा श्री मांगेराम गुप्ता तत्कालीन वितमंत्री हरियाणा सभापति के रूप में आ चुके है।
बाबूजी को 1989 मे उत्तर भारत स्वतन्त्रता सैनानी परिषद का सर्वसम्म्ति से प्रधान बनाया गया। बाबूजी ने वर्ष 1995 तक सर्व सेवा संध के लिये कार्य किया । वह उसकी कार्यकारणी के विषेष आमत्रित सदस्य थे। वह महाराजा अग्रसेन मेडीकल एवम रिसरर्च संस्थान अग्रोहा की प्रबन्धन समीति के सक्रिय सदस्य भी रहे है। बाबूजी क्ंलंदंदक ब्मदजमदंतल क्मदजंस ब्वससमहम यमुनानगर की कार्यकारणी के सदस्य भी रहे है। बाबूजी आजादी बचाओ अन्नदोलन समीति की हरियाणा राज्य इकाई के अध्यक्ष भी रहे है। बाबूजी गुरू गोबिन्द सिह फाउडेषन चण्डीगढ की प्रबन्धन समीति के सदस्य और उसकी सम्पतीयो की देखभाल के लिये बनाई ट्रस्ट के ट्रस्टी भी रहे है। नवम्बर 1996 मे खालसा पथ्ंा की 300 वी जयन्ती मनाने व वर्ष 1999 को ष्भ्नउंद ैचपतपजष् के रूप मे मनाने के उपलक्ष मे फाउडेान द्वारा भेजे गये प्रतिनिधिमडल के सदस्य के रूप मे बाबूजी ने सयुक्त राज्य अमेरीेका की यात्रा करी। वर्ष 1996 मे बाबूजी को उनके उच्च व्यक्तित्व व राष्ट्र के प्रति उनकी सेवाओ व कुरबानीयो को मघ्यनजर रखते हुए तत्कालीन चौ0 बंसी लाल सरकार द्वारा उन्हे स्वतन्त्रता की 50वी जयन्ती व नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की जन्म षताब्दी मनाने के लिये बनाई गई राज्य स्तरीय समीतियो व षराबबन्दी के लिये बनाई गई राज्य स्तरीय समीति का स्थाई सदस्य बनाया गया।
बाबूजी अपने जीवन के अतिम समय तक सामाजिक कार्य व दलित सेवा मे सक्रिय रहे तथा 12 सितम्बर 1997 को प्रभु के चरणो मे लीन हो गये। बाबूजी के पार्थिव षरीर का राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया। राजनेताओ , स्वतन्त्रता सेनानीयो व बडी सख्या मे वरीष्ठ नागरीको ने उन्हे अश्रुपूर्ण विदाई दी। श्री कृष्णकांत तत्कालीन उपराष्ट्र्रपति भारत सरकार, श्री महावीर प्रसाद तत्कालीन राज्यपाल हरियाणा ,चौ0 बंसी लाल तत्कालीन मुख्यमंत्री हरियाणा, व कई अन्य महत्वपूर्ण व्यक्तीयो ने बाबूजी के निधन पर गहरी संवेदना वयक्त करी। बाबूजी ,एक विचारक, एक राजनैतिक संत , निर्धनो के हितेषी और एक समाज सुधारक के रूप मे सदैव याद आते रहेगे।

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