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संपादकीय

…तो क्या आमजन का उपभोक्ता अधिकार "जानने का हक़" दफ़न कर दिया जाएगा?

August 21, 2015 11:53 AM

राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग नई दिल्ली के तीन मेंबर बेंच ने अपने एक अहम फैसले में 8 जनवरी 2014 को पुनरीक्षण याचिका संख्या RP/3146/2012 (संजय कुमार मिश्रा बनाम लोक सूचना अफसर) को लोक प्राधिकारी एवं लोक सूचना अफसर की अपील को स्वीकार करते हुए सूचना अधिकार आवेदक द्वारा दायर की गई सभी अपील को ख़ारिज कर दिया है । पूरे देश के सूचना अधिकार कार्यकर्ता को उपभोक्ता क़ानून के एडिशनल रेमेडी नहीं मिलने से खासी नाराजगी है। उनका कहना है की उपभोक्ता क़ानून में साफ़ साफ़ लिखा है की सेक्शन 3 के तहत मिल रही एडिशनल रेमेडी सभी लॉ यूजर को उपलब्ध है सिर्फ "मुफ्त सेवा" या "व्यक्तिगत सेवा के अनुबंध" को छोड़कर।  

सूचित होने का अधिकार नहीं, सूचना का अधिकार भी नहीं तो उपभोक्ता क़ानून में सेवा की परिभाषा में वर्णित "समाचार या सूचना का संचयन/ एकत्रीकरण" को आमजन कैसे हासिल करेगा। 

"जानने का हक़"- इतिहास एवं कानूनी पहलु:
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत एक मौलिक अधिकार :
आज के दौर में लोगों के प्रतिदिन के जीवन में "सूचना" बड़ा ही महत्वपूर्ण हो गया है। 1975 में राजनारायण के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने इस "जानने के हक़" को एक आकार देने की कोशिश की और कहा- जनता को सरकार की हर सच्चाई जानने का हक़ है कि सरकार उनके पैसे को कैसे खर्च कर रही है, जानने का हक़ भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 में वर्णित मौलिक अधिकार "बोलने एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" से सम्बंधित है क्योंकि जबतक आमजन के पास सूचना नहीं होगी वो अपने अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता का उपयोग नहीं कर सकता है ।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत एक उपभोक्ता अधिकार:
1986 में जब उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित किया गया तो इसमें भी उपभोक्ता को जानने का हक़ दिया गया, क्योंकि जबतक उपभोक्ता के पास किसी भी सेवा या सुविधा (जिसे वो लेना चाहता है) के सम्बन्ध में पूरी जानकारी नहीं होगी तबतक वो अपने उपभोक्ता अधिकार "चुनने के अधिकार" का समुचित उपयोग नहीं कर सकता। अधिनियम की धारा 6 में उपभोक्ता को सुने जाने का अधिकार, शिकायत निवारण का अधिकार, एवं सूचित होने का अधिकार दिया गया है। लेकिन ये दुर्भाग्य ही है कि 1986 से लेकर आज तक उपभोक्ता को "सूचित होने का अधिकार" नहीं मिला। लोगों की शिकायतें दफ्तरों में महीनो सालों लंबित पड़ी रहती थी, उन शिकायतों का क्या हुआ और कब तक में उनका निपटारा होगा कुछ भी सूचना नहीं मिलती थी। दफ्तरों के चक्कर काट—काट कर कितनों के जूते घिस गए लेकिन न तो आमजन सूचित किये गए, न ही उनके शिकायत में उनको सुना गया और न ही उनके शिकायत का निवारण किया गया। उपरोक्त सभी उपभोक्ता अधिकार फाईलों में दम तोड़ते रहे। जिनके पास पैसे थे वो दफ्तर के बाबुओं एवं चपरासियों की सेवा उन्हें रिश्वत देकर, लेते रहे। उपभोक्ता क़ानून को अतिरिक्त उपचार का भी अधिकार दिया गया जिसके तहत किसी अन्य क़ानून के तहत ली जाने वाली सेवा या सुविधा अगर आपको नहीं मिली है तो उसकी शिकायत यहाँ करके वांछित सेवा के साथ हानि एवं अन्याय का मुआवजा भी पा सकते है।

पभोक्ता क़ानून के सेक्शन 6 के तहत "सूचित होने का अधिकार" हमारा उपभोक्ता अधिकार:
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 में विधि निर्माताओं ने हम नागरिकों को सेक्शन 6 के तहत "सूचित होने का अधिकार" दिया गया है, लेकिन विधि निर्माताओं को इसका आभास हो गया था कि आने वाले समय में आमजन सूचित नहीं हो सकता है क्योंकि अधिकारीगण जब सूचित करेंगे तभी तो आमजन सूचित होंगे। इस स्थिति से निपटने के लिए हमारे विधि निर्माताओं ने आमजन को सूचना मांगने का हक़ दिया और सेक्शन 2 में वर्णित "सेवा" की परिभाषा में बैंकिंग, बीमा, परिवहन, हाउसिंग आदि आदि के साथ "खबर या सूचना का संग्रहण या इसे मुहैया कराना" को शामिल कर दिया ताकि आमजन उपरोक्त सेवा या सुविधा किसी भी प्रचलित क़ानून के तहत ले सकता है एवं किसी भी प्रकार के खामी की स्थिति में उपभोक्ता क़ानून के तहत शिकायत भी दर्ज करा सकता है और अतिरिक्त उपचार के रूप में वांछित सुविधा के साथ हर्जाना भी मांग सकता है। हमारे विधि निर्माताओं ने तो अपना काम कर दिया लेकिन अब जब बारी आई उन अधिकारियों की जिनके ऊपर उपरोक्त अधिकारों को सुनिश्चित करने की जिम्मेवारी है तो वे इसे आमजन को देने में गुरेज कर रहे है।

उपभोक्ता अधिकार "जानने का हक़" किस क़ानून के तहत ली जा सकती है।
1. सूचना का अधिकार अधिनियम 2005: जानने का हक़ प्राप्त करने का मुख्य जरिया सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 है जिसके तहत सभी कुछ निर्देशित है कि किस तरह की सूचना किससे मांगी जाये, कितनी फीस दी जायेगी, कितने दिन में सूचना मिलेगी, नहीं मिलती है तो क्या करना है आदि आदि एक पूरी प्रक्रिया का विवरण है। लेकिन अफ़सोस कि उपभोक्ता फोरम ने इसके तहत आने वाली शिकायत को सुनने से मना कर दिया यह कहकर कि इस क़ानून के तहत कमी की शिकायत उसे सुनने का अधिकार नहीं है क्योंकि सेक्शन 23 में किसी भी कोर्ट को सुनवाई से मना किया गया है।

2. भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872: जानने का हक़ प्राप्त करने का दूसरा जरिया भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 है जिसके सेक्शन 76 के तहत फीस देकर किसी भी पब्लिक ऑफिस से किसी भी पब्लिक दस्तावेज की सत्यापित प्रतिलिपि मांगी जा सकती है, लेकिन आमजन एवं अधिकारियों में इस क़ानून के बारे में समुचित जानकारी नहीं होने के कारण ये रास्ते अभी सिरे नहीं चढ़ पा रही है।

सूचना अधिकार क़ानून 2005 के तहत एक कानूनी अधिकार:
2005 में जानने के हक़ को "सूचना अधिकार अधिनियम" के नाम से पारित किया गया, इसके द्वारा आमजनों को दो मैसेज दिया गया कि आपको अधिकारी सूचित नहीं तो कोई बात नहीं अब इस क़ानून के तहत आप सूचना मांगो और अब आप सूचित जरूर होंगे वो भी 30 दिनों के अंदर अंदर। अब आपने अपने काम या शिकायत से सम्बंधित सूचना के लिए दफ्तर के बाबू या चपड़ासी की सेवा नहीं लेना है बल्कि क़ानून के तहत फीस भरकर पीआईओ (लोक सूचना अफसर) की सेवा लीजिये और वो आपके काम या शिकायत के बारे में पूरी जानकारी देंगे। लेकिन अधिकारियों के रवैये में ज्यादा बदलाव नहीं आया। अधिकारी सूचना देते ही नहीं थे या देने में काफी आनाकानी करते थे। चक्कर लगवाने का सिलसिला खत्म नहीं हुआ। सूचना आयुक्त जो कि किसी न किसी विभाग के ही सेवानिवृत अधिकारी होते है, ने भी अफसरों को कुछ जुर्माना तो किया लेकिन अधिकतर केसों में जुर्माने से उसे बचाते रहे लेकिन आमजन को फिर भी देरी, या अन्याय के लिए कोई मुआवजा नहीं मिलता था।
सूचना आयोग के कार्यकलापों से नाखुश आमजन फिर से अतिरिक्त उपचार लेने के लिए कंज्यूमर फोरम आने लगे। देश के कुछ फोरम ने सूचना को उपभोक्ता क़ानून में वर्णित सेवा/ सुविधा से जोड़कर सूचना अधिकार आवेदक को मुआवजा भी दिलवाया तो कुछ फोरम ने इसे सेवा या सुविधा मानने से इंकार करके शिकायत को खारिज कर दिया।

अनसुलझे कानूनी सवाल:
अगर सूचित होने का अधिकार नहीं, सूचना का अधिकार भी नहीं तो उपभोक्ता क़ानून में सेवा की परिभाषा में वर्णित "समाचार या सूचना का संचयन/ एकत्रीकरण" को आमजन कैसे हासिल करेगा।
भारतीय न्याय प्रणाली के बारे में अक्सर कहा जाता है कि न्याय देने वाले अगर न्याय देने पर उतारू हो जाते है तो विदेशों में प्रचलित कानून का भी हवाला देते हुए न्याय कर देते हैं लेकिन अगर न्याय करने की इच्छा नहीं हो तो अपने देश के कानून की किताबों में लिखे शब्द को भी दरकिनार कर देते है।
सूचना चाहने वाले आमजन बेबस है, कंज्यूमर फोरम इस तरह की शिकायतों को सिर्फ खारिज करने में लगे हुए हैं ये बताने तक को तैयार नहीं है कि आमजन को उनका उपभोक्ता अधिकार "जानने का हक़" किस कानून के तहत मिलेगा या नहीं मिलेगा और किताबों में ही दफ़न होकर रह जाएगा? और अगर दफ़न ही होना है तो उपभोक्ता क़ानून के सेक्शन 2 में वर्णित और कौन कौन सी सेवा दफ़न होने के लिए है? अगर और कोई सेवा दफ़न नहीं होना है किसी न किसी क़ानून के तहत आमजन को मिलना है तो सिर्फ जानने का हक़ ही दफ़न क्यों किया जा रहा है।

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