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संपादकीय

भारत का संविधान रो रहा है! क्या हमें संविधान का विलाप सुनाई नहीं देता?

January 18, 2016 06:10 PM
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 में कानून के समक्ष समता और कानून के समान संरक्षण की गारण्टी का मूल अधिकार है। जबकि अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति के सम्मान और गरिमा की गारण्टी का मूल अधिकार प्रदान करता है। दोनों अधिकारों को अक्षुण्य बनाये रखने की जिम्मेदारी केन्द्र और राज्य सरकार की है। इसके उपरान्त भी यदि मूल अधिकारों का हनन या उल्लंघन होता है तो अनुच्छेद 32 में सुप्रीम कोर्ट और अनुच्छेद 226 में हाई कोर्ट को उचित आदेश देकर मूल अधिकारों की रक्षा करने का दायित्व सौंपा गया है। इस सबके उपरान्त भी राजस्थान में पाली जिले में भूतपूर्व मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत की मौजूदगी में और दलित वर्ग की दुल्हन नीतू द्वारा सरकार को अग्रिम सूचना दिये जाने के बाबजूद, राष्ट्रीय अजा आयोग के निर्देशों के बावजूद भी राजस्थान सरकार और स्थानीय प्रशासन दूल्हा और दुल्हन पक्ष को इस बात के लिये आश्वस्त नहीं कर सके कि यदि घोड़ी चढाई की रश्म पूर्ण की जाती है तो भविष्य में उनकी जानमाल को मनुवादियों से कोई खतरा नहीं होने दिया जायेगा। दुष्परिणामस्वरूप दूल्हे पक्ष भय से मुक्त नहीं हो सका और विवाह के बाद की सम्भावित प्रताड़ना के डर से आतंकित होकर घोड़ी पर चढे बिना ही तोरण मारा गया।  देश के संविधान और मानव गरिमा को सम्मान देने वाले लोगों को इस घटना को हलके से नहीं लिया जाना चाहिये। इस घटना से पता चलता है कि राजस्थान में दलितों के दिलोदिमांग में कितना भय व्याप्त है। वे किस प्रकार से भयाक्रांत हैं। मनुवादी व्यवस्था का भय और आतंक किस सीमा तक व्याप्त है कि दूल्ह पक्ष की दृष्टि में एक दिन घोड़ी पर चढ जाने की खुशी के बजाय, शेष जीवन असानी से नहीं जी पाने का भय भारी हो गया। हो भी क्यों नहीं, जबकि आये दिन दलितों पर अमानवीय उत्पीड़न होता रहता है।  यह घटना स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार के लिये चुनौती है। सरकार को ऐसे हालातों का नवनिर्माण करना होगा कि अब हर एक के दिल में समानता का भाव पैदा हो। सभी के सम्मान की परवाह सभी करें। हमारे लिये और दलित संगठनों के लिये भी यह घटना बहुत बड़ी चुनौती है। चिन्ता का विषय है। यहां पर यह बात भी ध्यान देने की है कि दूल्हे पक्ष भय के कारण घोड़ी पर नहीं चढ सका, यह घटना स्थानीय समाचार-पत्रों में प्रमुखता से प्रकाशित हुई, लेकिन विवाह के बाद राज्य सरकार की ओर से इस पर कोई कार्यवाही नहीं की गयी है। किसी दलित राजनेता या जनप्रतिनिधि ने इस माले को गम्भीरता से नहीं उठाया।  हम सब के लिये एक गणतांत्रित संविधान के होते देश में इस प्रकार के हालात शर्म का विषय हैं। अब सभी सामाजिक न्याय के चिन्तकों को विचार करना होगा कि वंचित वर्गों को, मनुवादी शोषित वर्गों के आतंक से किस प्रकार से सुरक्षा और संरक्षण प्रदान किया जाये? संविधान के कठोर प्रावधानों के होते हुए कार्यपालिक, व्यवस्थापालिका, न्यायपालिका और प्रेसपालिका सब के सब ऐसे मामलों में ठीक से रश्म-अदायगी तक नहीं करते हैं। इन आमनवीय और असंवैधानिक हालातों को हर हाल में बदलना होगा। कुछ लोगों को सामने आना ही होगा। कुछ को अपने समय का और ऊर्जा का बलिदान भी करना होगा। अन्यथा वंचित वर्गों की दशा, बद से बदतर होती रहेगी और संविधान यों हीं विलाप करता रहेगा। भारत का संविधान रो रहा है! क्या हमें संविधान का विलाप सुनाई नहीं देता?
जय भारत। जय संविधान।
नर-नारी सब एक समान।।
 
                                                                                            लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' 
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