नव ठाकुरीया
1971—पाकिस्तान के खिलाफ निर्णायक युद्ध में भारत ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की और बांग्लादेश नाम से एक नए राष्ट्र का जन्म हुआ। पर इस विजय का सबसे बड़ा बोझ भारत के ही एक छोटे राज्य—असम—को उठाना पड़ा। लाखों पूर्वी पाकिस्तानी शरणार्थियों का बोझ उसके कंधों पर ऐसा आ पड़ा, जिसकी कीमत वह आज तक चुका रहा है। दुखद यह है कि उसकी पुकार सुनने वाला कोई नहीं।
गरीबी से जूझते बांग्लादेश के साथ लगी छिद्रपूर्ण सीमा, केंद्र और राज्य सरकारों की कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति और बहुसंख्यक असमिया समाज की वर्षों की उदासीनता ने स्थिति को और भयावह बना दिया। नतीजा यह कि आज भी असम शरणार्थी संकट की आग में झुलस रहा है।
नई दिल्ली में बैठे उस समय की केंद्र सरकार ने पश्चिमी पाकिस्तान के खिलाफ पूर्वी पाकिस्तान के स्वतंत्रता सेनानियों—मुक्ति वाहिनी—का समर्थन किया। 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना को आत्मसमर्पण करना पड़ा। मगर किसी ने भी न तो नवगठित बांग्लादेश सरकार से शरणार्थियों को वापस लेने की औपचारिक मांग की, न ही प्रवासियों की वापसी के लिए कोई रणनीति बनाई। नतीजा यह हुआ कि 1985 में हुए असम समझौते के तहत अवैध प्रवासियों की पहचान के लिए कट-ऑफ वर्ष 25 मार्च 1971 तय करना पड़ा।
सरकार का तर्क था कि ढाका, पूर्वी पाकिस्तानी नागरिकों को वापस लेने के लिए तैयार नहीं था। ऐसे में अवैध प्रवासियों (ज्यादातर मुस्लिम) को भारत से निर्वासित करना असंभव हो गया। अंततः असम आंदोलनकारियों को भारी दबाव में उन्हें भारतीय नागरिक मानने पर मजबूर किया गया। सवाल यह है कि आंदोलनकारियों—खासकर ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन—ने उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से संसद में बहस और औपचारिक समझौते की मांग क्यों नहीं की? क्यों अकेले असम को इस बोझ तले दबना पड़ा?
विडंबना यह रही कि संसद चुप रही, मीडिया खामोश रहा और देश के बुद्धिजीवी वर्ग ने भी असमिया समुदाय पर थोपे गए इस ऐतिहासिक अन्याय के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई। तकरीबन पच्चीस लाख (25 लाख) पूर्वी पाकिस्तानी अवैध तरीके से भारतीय बन बैठे और किसी को इसकी गंभीरता का अंदाजा तक नहीं हुआ। सच यह है कि अगर असम इस बोझ से टूटेगा, तो उसके नकारात्मक प्रभाव पूरे देश में फैलेंगे।
दूसरों की तो बात ही छोड़िए, असम के अपने राजनीतिक विश्लेषक, पत्रकार और समाजसेवी भी इस खतरे को समय रहते सामने नहीं ला सके। आंदोलन और उसके बाद की राजनीति में लगभग सभी ने लाभ उठाया, सिवाय असमिया समाज के—जो आज भी न्याय की तलाश में है। और अब वही खतरा धीरे-धीरे भारत के अन्य हिस्सों में भी दिखाई देने लगा है।
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने हाल ही में साफ कहा—बांग्लादेश का निर्माण केवल आधा लक्ष्य था, असली अवसर तो तब गँवा दिया गया जब भारत ने शरणार्थियों की वापसी और जनसांख्यिकीय संतुलन को सुरक्षित करने का ऐतिहासिक मौका खो दिया।
भारत की सैन्य विजय अद्भुत थी—पाकिस्तान टूट गया और बांग्लादेश पैदा हुआ। मगर यह राजनीतिक नेतृत्व की विफलता थी कि वह इस जीत को स्थायी रणनीतिक लाभ में नहीं बदल सका। बीजेपी नेता सरमा का कहना है कि अगर इंदिरा गांधी आज जीवित होतीं, तो देश उनसे पूछता कि भारतीय सेना की निर्णायक विजय को उन्होंने गलत तरीके से क्यों संभाला।
भारत ने बांग्लादेश को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने में समर्थन दिया, मगर 1988 तक ढाका ने इस्लाम को राज्य धर्म घोषित कर दिया। आज वही राजनीतिक इस्लाम वहाँ फल-फूल रहा है, जो भारत के बलिदान की आत्मा को ही कमजोर कर रहा है।
स्थिति भयावह है—बांग्लादेश में हिंदू आबादी, जो कभी 20% से अधिक थी, आज घटकर महज़ 8% रह गई है। सुनियोजित भेदभाव और हिंसा ने उन्हें मिटा दिया है।
सरमा ने कांग्रेस पर भी करारा हमला किया। उन्होंने कहा—सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) पर भारत बातचीत कर सकता था, पर मौका खो दिया गया। इसी तरह, रणनीतिक चटगांव बंदरगाह तक पहुँच को सुरक्षित नहीं किया गया। नतीजा यह कि आज असम, पूर्वोत्तर और पश्चिम बंगाल अनियंत्रित जनसांख्यिकीय बदलाव, राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक अशांति से जूझ रहे हैं।