नव ठाकुरीया
क्या यह सामान्य स्थिति है कि भारतीय प्रेस परिषद (Press Council of India-PCI) जैसी अर्ध-न्यायिक और वैधानिक संस्था सप्ताहों तक बिना अध्यक्ष के काम करे? क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में पत्रकारिता की निगरानी करने वाली सर्वोच्च संस्था खुद नेतृत्व संकट से जूझ सकती है? वास्तविकता यह है कि PCI की 15वीं काउंसिल आज न केवल अध्यक्ष विहीन है, बल्कि कुल 28 में से 13 अहम पद भी रिक्त पड़े हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या प्रेस परिषद अपने वैधानिक कर्तव्यों का प्रभावी ढंग से निर्वहन कर पा रही है।
भारतीय प्रेस परिषद की पूर्व अध्यक्ष, सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई का नियमित तीन वर्षीय कार्यकाल—छह महीने के विस्तारित कार्यकाल सहित—16 दिसंबर 2025 को समाप्त हो चुका है। इसके बावजूद, नए अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर अब तक कोई आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है। हैरानी की बात यह है कि PCI की आधिकारिक वेबसाइट (https://www.presscouncil.nic.in/CurrentChairperson.aspx) पर आज भी न्यायाधीश देसाई को ही 17 जून 2022 से कार्यरत अध्यक्ष के रूप में दर्शाया जा रहा है, जबकि उन्हें पहले ही आठवें वेतन आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया जा चुका है।
नेतृत्व संकट यहीं तक सीमित नहीं है। PCI की 14वीं काउंसिल का कार्यकाल 5 अक्टूबर 2024 को समाप्त हो चुका था। इसके बाद वैधानिक 15वीं काउंसिल के गठन की प्रक्रिया शुरू तो हुई, लेकिन विभिन्न प्रशासनिक और कानूनी अड़चनों के चलते वह अब तक पूरी नहीं हो सकी।
फिलहाल प्रेस परिषद में जो सदस्य कार्यरत हैं, उनमें राज्यसभा से सुधांशु त्रिवेदी और बृज लाल; लोकसभा से संबित पात्रा, नरेश म्हस्के और काली चरण मुंडा; विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से अश्विनी के. मोहपात्रा; बार काउंसिल ऑफ इंडिया से मनन कुमार मिश्रा; तथा साहित्य अकादमी से के. श्रीनिवासराव शामिल हैं। इसके अलावा, बड़े, मध्यम और छोटे समाचार पत्रों के मालिक या प्रबंधन से जुड़े सदस्यों में सुधीर कुमार पांडा, एम.वी. श्रेयम्स कुमार, गुरिंदर सिंह, अरुण कुमार त्रिपाठी, ब्रज मोहन शर्मा और आरती त्रिपाठी शामिल हैं।
हालाँकि, 28 सदस्यीय PCI में पेशेवर पत्रकारों का प्रतिनिधित्व करने वाले 13 सदस्यों का होना अनिवार्य है—जिनमें छह संपादक और सात कार्यरत पत्रकार शामिल होने चाहिए। वर्तमान में ये सभी 13 सीटें खाली हैं, जो परिषद की वैधानिक संरचना को अधूरा बनाती हैं। पिछले कुछ दिनों में इस लेखक ने PCI ऑफिस को कई आधिकारिक पत्र भेजे, जिसमें मौजूदा PCI टीम के बारे में जानकारी मांगी गई थी, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ (यहां तक कि एक शिष्टाचार वाला जवाब भी नहीं आया)।
यह संकट तब और गहराया जब कई राष्ट्रीय मीडिया संगठनों ने PCI के नियमों में प्रस्तावित संशोधनों का विरोध किया। इन संशोधनों के तहत विभिन्न प्रेस क्लबों से प्रतिनिधियों के चयन का प्रावधान किया गया था। कई संगठनों ने इसे अदालत में चुनौती दी, जिससे मामला और उलझ गया। विरोध करने वाले संगठनों का तर्क है कि प्रेस क्लब मूलतः सामाजिक या मनोरंजन केंद्रित संस्थाएं होती हैं, जिनका प्रभाव क्षेत्र अक्सर किसी एक शहर या इलाके तक सीमित रहता है। इसके अलावा, कई प्रेस क्लब गैर-कार्यरत पत्रकारों—जैसे शिक्षाविद, लेखक, फिल्म हस्तियां और राजनयिकों—को भी सदस्यता देते हैं, जिससे पेशेवर मीडिया कर्मियों के हितों का समुचित प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता।
स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो प्रेस क्लब, प्रेस गिल्ड या मीडिया क्लब—भले ही उनका नाम राष्ट्रीय स्तर का क्यों न हो—पूरे भारत का प्रतिनिधि संगठन नहीं हो सकते। इसके विपरीत, मान्यता प्राप्त पत्रकार संघों में देश के विभिन्न हिस्सों से कार्यरत पत्रकार सदस्य होते हैं, जो व्यापक और संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करते हैं।
यदि भारतीय प्रेस परिषद लंबे समय तक बिना अध्यक्ष के बनी रहती है, तो यह गंभीर प्रश्न खड़ा होता है कि भारतीय प्रिंट मीडिया समुदाय की निगरानी और संरक्षण कौन करेगा। भारत में Registrar of Newspapers for India -RNI द्वारा मान्यता प्राप्त 1 लाख से अधिक प्रकाशन हैं। इसके साथ-साथ, एक अरब से अधिक आबादी वाले इस देश में लगभग 400 सैटेलाइट समाचार चैनल, लाखों डिजिटल न्यूज़ पोर्टल, व्हाट्सएप चैनल और अन्य ऑनलाइन मीडिया प्लेटफॉर्म सक्रिय हैं।
यह भी उल्लेखनीय है कि PCI का अधिकार क्षेत्र फिलहाल केवल अखबारों, पत्रिकाओं और समाचार एजेंसियों तक सीमित है। इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया का बड़ा हिस्सा इसके दायरे से बाहर है। इसके बावजूद, प्रेस परिषद के पास यह अधिकार है कि वह समाचार पत्रों, उनके संपादकों और कार्यरत पत्रकारों के खिलाफ पेशेवर आचरण के उल्लंघन से जुड़ी शिकायतों की सुनवाई कर सके और आवश्यक दिशा-निर्देश या दंडात्मक कार्रवाई कर सके। साथ ही, प्रेस की स्वतंत्रता सुनिश्चित करते हुए, यदि किसी सरकार का आचरण अनुचित पाया जाता है, तो उस पर अवलोकन दर्ज करना भी PCI का वैधानिक दायित्व है।
यही कारण है कि लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि समाचार चैनलों, रेडियो और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म को भी किसी रूप में PCI के अधिकार क्षेत्र में लाया जाए। लेकिन इसके लिए सबसे पहली आवश्यकता यह है कि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया स्वयं नेतृत्व संकट से बाहर निकले, उसकी सभी रिक्तियां भरी जाएं और उसे एक पूर्णकालिक अध्यक्ष का मार्गदर्शन मिले। (लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार हैं)