मनमोहन सिंह
बड़ा अजीब रिश्ता है बीजेपी और कांग्रेस का। मामला सोलन की चेस्टर हिल्स का हो बात नालागढ़ की कैनविन फैक्ट्री का, प्रदेश के ये दोनों दल चुप्पी साध कर बैठे हैं। निजी तौर पर इक्का दुक्का नेताओं ने बयान दे कर रस्म अदायगी ज़रूर की है पर पार्टी के तौर पर दोनों में से एक भी पार्टी मुखर हो कर लोगों के साथ खड़ी नज़र नहीं आ रही।
किसी में भी रात को रात कहने की हिम्मत नहीं या फिर नियत नहीं। पार्टी के तौर पर अगर कोई लोगों के साथ है तो चेस्टर हिल्स मामले में सीपीएम और केनविन फैक्ट्री के मामले में सीपीई। बाकी दोनों मुख्य दल बीजेपी और कांग्रेस और इनके साथ पूरी अफसरशाही सोलन में चेस्टर हिल्स के प्रमोटर के साथ और वहां कैनविन फैक्ट्री के मालिकों के साथ खड़े दिखते हैं।
चेस्टर हिल्स में जिस तरह अरबों रूपये के बेनामी सौदे हुए और जिस तरह तत्कालीन एस डी एम की रिपोर्ट को प्रदेश के मुख्य सचिव ने अपने प्रशासनिक अधिकारों से बाहर जा कर बिना किसी जांच के निरस्त कर दिया उस पर सरकार कोई ध्यान देना भी ज़रूरी नहीं समझ रही। जैसे इंसाफ के बारे में कहा जाता है कि "इंसाफ होना ही काफी नहीं, यह लगना भी चाहिए कि इंसाफ हुआ है"। इसी तरह अगर प्रदेश की कांग्रेस सरकार चेस्टर हिल्स और केनविन फैक्ट्री के बारे में कोई गम्भीर कदम उठाने जा रही है तो वह आम आदमी को नज़र भी आना चाहिए।
केनविन फैक्ट्री क्या है मामला
इस फैक्ट्री के खिलाफ जूझ रहे लोगों में नरेश घई ने बताया कि इस फैक्ट्री को चीन की सरकार ने वहां अपना काम जारी रखने की इज़्ज़त नहीं दी। एक तरह से इसे वहां से भगा दिया। वहां से भाग कर ये लोग भारत आ गए। यहां सरकारों और अफसरशाही से मिल कर या फैक्ट्री नालागढ़ में लगा दी गई। तब तक न फैक्ट्री के मालिकों, सरकार, राज नेताओं, और अफसरों ने किसी को यह भनक तक नहीं लगने दी कि असल में इस फैक्ट्री में क्या बनेगा और उसका यहां के वातावरण, जलस्रोतों, इंसानी ज़िंदगी पर कितना भयानक असर पड़ेगा।
लोगों और जनप्रतिनिधियों को यह बताया गया था कि इस फैक्ट्री के लिए पानी की व्यवस्था भाखड़ा नहर से की जाएगी, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। घई ने बताया कि इस फैक्ट्री लगाने की शर्तों में साफ लिखा कि यह फैक्ट्री ऐसी जगह लगनी चाहिए जहां दूर दूर तक इंसान तो क्या जानवर भी न रहते हों। लेकिन यहां तो इसे नालागढ़ के जलस्त्रोत के बिलकुल साथ लगा दिया गया है। जाहिर है जिस सरकार ने इसे लगाने की इजाज़त दी उसे भी यह शर्त पता होगी। जिन अफसरों ने इसके कागज़ात तैयार किए उन्हें भी यह सब मालूम होगा। फिर पूरा देश छोड़ कर इसे यहां क्यों लगाया गया। असल में यह फैक्ट्री कुछ ऐसा रसायन बनाती है जो दवाओं में काम आता है लेकिन उसे रिहायशी इलाकों के नज़दीक बनाना प्राणीमात्र के लिए घातक है।
लोग चाहते हैं कि इस फैक्ट्री को बंद कर दिया जाए। जब कि मालिक कहते हैं कि उनका अरबों रुपया इस पर लगा है इस कारण इसे बंद नहीं कर सकते। अब यह सरकार को सोचना है कि अरबों रुपए के सामने इंसानी जीवन कितना सस्ता या मंहगा है। पता नहीं क्यों यह सब लिखते लिखते मेरे जहन में अपने स्कूल के दिनों में पढ़ी एक लकोक्ति आ गई। उस समय इसका अर्थ समझ में नहीं आता था। पर अब लगता है कि कुछ कुछ समझ में आने लगा है। लोकोक्ति थी- 'दाम बनाए काम'।