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खेल

इतिहास के पन्नों से भारतीय हॉकी के 100 साल : आजादी के बाद हॉकी का संघर्ष

November 09, 2025 09:32 AM

मनमोहन सिंह

दूसरी आलमी जंग 1945 में खत्म हुई। इस जंग के कारण अंग्रेजी हुकूमत काफी कमज़ोर हो चुकी थी। और 15 अगस्त 1947 को हमारा देश आज़ाद हो गया। पर इसके साथ ही इसका बटवारा भी हुआ। इस बंटवारे का बहुत बुरा असर भारतीय हॉकी पर भी हो गया। टीम के बहुत से खिलाड़ी पाकिस्तान चले गए। विश्व की सबसे मजबूत टीम टूट गई। इसलिए जब 1948 के लन्दन ओलंपिक की घोषणा हुई तो भारत को अपनी टीम बनाने के लिए बहुत जद्दोजहद करनी पड़ी।

देश अभी बंटवारे और शरणार्थियों की समस्या से जूझ रहा था। देश की अर्थव्यवस्था बिखरी हुई थी लेकिन फेडरेशन के तत्कालीन अध्यक्ष नवल टाटा की कोशिशों से टीम तैयार की गई। उस टीम के कप्तान थे किशन लाल। बलबीर सिंह सीनियर का यह पहला ओलंपिक था। इस ओलंपिक में कुल 13 टीमें थी जिन के तीन पूल बनाए गए थे। भारत ने अपने पूल मैचों में ऑस्ट्रिया को 8-0 से, अर्जेंटीना को 9-1 से, और स्पेन को 2-0 से मात दी। उसने सेमीफाइनल में हॉलैंड को 2-1 से और फाइनल में मेज़वाल इंग्लैंड को 4-0 से हरा कर आज़ाद भारत के लिए पहला गोल्ड मेडल जीता। कुल मिला कर भारत का यह लगातार चौथा गोल्ड था। इसमें इंग्लैड को सिल्वर और हॉलैंड को ब्रॉन्ज मिला। पाकिस्तान चौथे स्थान पर रहा।

भारत और इंग्लैंड के बीच खेला गया फाइनल मैच भारत के लिए चिंता का कारण बन गया था क्योंकि जिस मैदान पर मैच खेला जाना था उसकी हालत बहुत खराब थी। रही सही कसर हॉलैंड और पाकिस्तान के बीच खेले गए तीसरे स्थान के मैच ने पूरी कर दी। उससे मैदान और भी खराब हो गया। टीम के कप्तान किशन लाल और मैनेजर डॉक्टर ए सी चैटर्जी बहुत चिंतित थे। लेकिन बलबीर सिंह सीनियर ने टॉप ऑफ डी से शानदार गोल कर सारी शंकाओं पर पानी फेर दिया। उसके बाद बलबीर ने ही दूसरा गोल कर के भारत को हॉफ टाइम तक 2-0 की मजबूत बढ़त दिल दी। हाफ टाइम के बाद पैट जानसन ने फील्ड गोल और त्रिलोचन सिंह ने पेनाल्टी कॉर्नर पर गोल दाग कर भारत को 4-0 से जीत दिलवा दी।

भारत की जीत का सिलसिला 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में भी जारी रहा। इस बार टीम की बागडोर दिग्विजय सिंह बाबू के हाथ थी। बाबू हॉकी के कलाकार माने जाते थे। उस ज़माने में राइट इन की पोजीशन पर खेलने वाला उन जैसा और कोई नहीं था। बाबू ने देश को पांचवां गोल्ड मेडल जीता दिया। भारत ने यहां खेले तीन मैचों में 13 गोल किए और मात्र दो खाए। भारत ने ऑस्ट्रिया को 4-0 से, ब्रिटेन को 3-1 से और फाइनल में हॉलैंड को 6-1 से मात दी। इन छह में से पांच गोल अकेले बलबीर सिंह सीनियर के थे, जो आज भी एक विश्व रिकॉर्ड है। कोई खिलाड़ी ओलंपिक फाइनल में पांच गोल नहीं कर पाया।

भारत की जीत का सिलसिला 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में भी जारी रहा। इस बार टीम की बागडोर दिग्विजय सिंह बाबू के हाथ थी। बाबू हॉकी के कलाकार माने जाते थे। उस ज़माने में राइट इन की पोजीशन पर खेलने वाला उन जैसा और कोई नहीं था। बाबू ने देश को पांचवां गोल्ड मेडल जीता दिया। भारत ने यहां खेले तीन मैचों में 13 गोल किए और मात्र दो खाए। भारत ने ऑस्ट्रिया को 4-0 से, ब्रिटेन को 3-1 से और फाइनल में हॉलैंड को 6-1 से मात दी। इन छह में से पांच गोल अकेले बलबीर सिंह सीनियर के थे, जो आज भी एक विश्व रिकॉर्ड है। कोई खिलाड़ी ओलंपिक फाइनल में पांच गोल नहीं कर पाया।

1956 के मेलबर्न ओलंपिक तक आते आते भारत को अहसास हो गया था कि अब दूसरी टीमें खासकर पाकिस्तान बहुत मजबूत बन गया है। इस कारण टीम में बलबीर सिंह सीनियर, रणधीर सिंह जेंटल, आर फर्नांडिस और लेसली क्लॉडियस जैसे अनुभवी खिलाड़ी लिए गए। ये सभी दो ओलंपिक खेल चुके थे। बाकी चार में रघुबीर लाल, ऊधम सिंह, अमीर कुमार और पेरुमल थे जो पहले एक ओलंपिक खेल चुके थे।

इन ओलंपिक खेलों में हॉकी की 12 टीमें थी जिन्हें तीन ग्रुपों में बांटा गया था। भारत के ग्रुप में सिंगापुर, अफगानिस्तान और अमेरिका की टीमें थी। जबकि पाकिस्तान का मुकाबला जर्मनी, बेल्जियम, और न्यूजीलैंड के साथ था। भारत ने अपने मैचों में अफगानिस्तान को 14-0 से हराया। इनमें से बलबीर सिंह सीनियर और ऊधम सिंह ने पांच पांच, जेंटल ने तीन और गुरदेव सिंह ने एक गोल किया। अगले मैच में अमेरिका के खिलाफ भारत 16-0 से जीता। इसमें ऊधम सिंह ने सात, हरदयाल सिंह ने चार, गुरदेव सिंह ने तीन और क्लॉडियस और चार्ल्स ने एक एक गोल किया। इसके बाद सिंगापुर से टक्कर में भारत 6-0 से विजयी रहा।

यहां चार्ल्स ने दो, ऊधम सिंह ने दो और जेंटल और हरदयाल ने एक एक गोल किया। सेमीफाइनल में भारत को जर्मनी से कड़ी टक्कर मिली और ऊधम सिंह के गोल की बदौलत भारत 1-0 से जीत सका। अब फाइनल पाकिस्तान से था। फ़ाइनल में रणधीर सिंह जेंटल के पेनल्टी कॉर्नर पर बनाए गोल से भारत ने पाकिस्तान को 1-0 हरा कर लगातार छठा गोल्ड मेडल अपने नाम किया। कांस्य पदक जर्मनी ने जीता।

1960 रोम ओलंपिक भारत के लिए निराशाजनक रहा। यहां भारत पहली बार हॉकी का गोल्ड नहीं जीत पाया। फाइनल में उसे पाकिस्तान ने 1-0 से हरा दिया। रोम ओलंपिक पर विस्तार से बात करेंगे कल।

 
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