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राष्ट्रीय

ई एस आई डिस्पेंसरी पंचकूला की दादागिरी- नियम मनवाऊंगा लेकिन मांगने पर नियम की कॉपी नहीं दिखाऊंगा

December 29, 2025 10:32 AM

पंचकूला, फेस2न्यूज ब्यूरो:
ई एस आई डिस्पेंसरी पंचकूला की दादागिरी का आलम ये है कि खुद के हाथों लिखा हुआ चिकित्सा प्रतिपूर्ति से संबंधित एक नियम दीवार पर चिपकाकर बीमा वर्कर को कहा जाता है कि ये दस्तावेज एवं प्रोसेस पूरा करके लाओ फिर बिल जमा होगा, जब बीमा वर्कर द्वारा विरोध किया जाता है तो मेडिकल ऑफिसर बोलते हैं, मुझे ऊपर से आदेश है कि ये प्रोसेस के तहत ही प्रतिपूर्ति बिल स्वीकार किया जाए। जब बीमा वर्कर द्वारा उस आदेश की कॉपी मांगी जाती है तो मेडिकल ऑफिसर बोलते हैं तुम जैसे बीमा वर्कर को हम ये आंतरिक आदेश की कॉपी नहीं दे सकते। जब बीमा वर्कर कहता है कि चुंकि उच्चाधिकारी के ये आदेश का प्रभाव बीमा वर्कर पर पड़ता है इसलिए बीमा वर्कर इस आदेश की कॉपी पाने का हकदार है, तो मेडिकल ऑफिसर बोलते हैं कि नहीं मिलेगा जो करना है कर लो। तुमको हम पैसा दे रहे हैं चिकित्सा प्रतिपूर्ति के तो नियम कानून मेरा ही चलेगा, यही प्रोसेस है यही नियम है, पूरा तो करना ही होगा। कितना भी समझाइए कि चिकित्सा प्रतिपूर्ति बीमा वर्कर को देना ई एस आई अधिनियम 1948 एवं ई एस आई केंद्रीय नियमावली 1950 के तहत एक कानूनी प्रक्रिया है जो ई एस आई डिस्पेंसरी के द्वारा बीमा वर्कर को मिलता है। बीमा वर्कर को चिकित्सा प्रतिपूर्ति कोई दान नहीं है या एहसान नहीं है बल्कि बीमा वर्कर का कानूनी हक है। 


ई एस आई डिस्पेंसरी पंचकूला के उपरोक्त दादागिरी का खुलासा तब हुआ जब एक जागरूक बीमा वर्कर संजय कुमार मिश्रा, ई एस आई नंबर 1208991676 के साथ ये वाकया हुआ। संजय कुमार मिश्रा ने इस बाबत अपना लिखित में शिकायत डिस्पेंसरी के एस एम ओ सहित हरियाणा ई एस आई हेल्थकेयर के निदेशक एवं ई एस आई के क्षेत्रीय निदेशक फरीदाबाद सहित ई एस आई के महानिदेशक को भी भेजी है।
नोटिस बोर्ड पर चिपकाए गए इस चिकित्सा प्रतिपूर्ति नियम के मुताबिक बीमा वर्कर जब भी कोई विशिष्ट उपचार चाहेगा तो उसे पहले डिस्पेंसरी से संबंधित अस्पताल के नाम का रेफरल स्लिप बनवाकर फिर उस विशिष्ट अस्पताल में डॉक्टर को दिखाएगा। जब उस विशिष्ट अस्पताल में डॉक्टर प्रेस्क्रिप्शन लिखता है तो वो दवाई लेने उसे डिस्पेंसरी में वापस आना है, डिस्पेंसरी के डॉक्टर उस विशिष्ट अस्पताल के प्रेस्क्रिप्शन के बेस पर अपना प्रेस्क्रिप्शन लिखेगा और डिस्पेंसरी के फार्मासिस्ट उपलब्ध दवाई देगा और अनुपलब्ध दवाई को मार्क कर देगा, फिर बीमा वर्कर उस अनुपलब्ध दवाई को बाज़ार से खरीद कर उपयोग करेगा। चिकित्सा प्रतिपूर्ति के लिए निर्धारित फॉर्म भरकर उस विशिष्ट अस्पताल के डाक्टर से हस्ताक्षर एवम् मुहर उस सभी बिल एवं प्रतिपूर्ति फॉर्म पर कराएगा तभी वो बिल डिस्पेंसरी द्वारा प्रतिपूर्ति के लिए स्वीकार किया जायेगा।
बीमा वर्कर का कहना है कि उपरोक्त नियम सिर्फ बीमा वर्कर को परेशान करने के लिए है ताकि बीमा वर्कर चक्कर मार—मार कर थक जाए और चिकित्सा प्रतिपूर्ति का ख़्याल अपने मन से निकाल दे।
इसी प्रेस्क्रिप्शन में बीमा वर्कर के साथ खेला भी हो जाता है, डिस्पेंसरी के डॉक्टर अपने पास उपलब्ध दवाइयों में से ही मिलता जुलता दवाई दे देते हैं, पूछने पर डॉक्टर कहते हैं कि हमारे पास जो दवाई उपलब्ध है उसी में से देंगे। बाहर का दवाई नहीं लिखेंगे। डिस्पेंसरी के डॉक्टर जोर देकर कहते हैं कि डिस्पेंसरी में उपलब्ध दवाई को उस विशिष्ट अस्पताल के डॉक्टर ने क्यों नहीं लिखा? बाहर का क्यों लिखा?
बीमा वर्कर का कहना है कि विशिष्ट अस्पताल के प्रेस्क्रिप्शन वाला दवाई ही डिस्पेंसरी से मिलना चाहिए ताकि बीमारी में सुधार हो, अन्य दवाई से बीमारी में सुधार नहीं होगा और रोगी लंबे समय तक बीमारी में दबा हुआ रहेगा, जिसका ब्लेम विशिष्ट अस्पताल के डॉक्टर पर कैसे डाला जाएगा कि आपके उपचार से रोगी ठीक नहीं हो रहा है।
फिर ई एस आई डिस्पेंसरी कोई गुरुद्वारे की मुफ्त वाली डिस्पेंसरी तो है नहीं जहां सिर्फ उपलब्ध दवाई ही दी जा सकती है, बाहर की दवाई अपने पैसे से लो। ई एस आई डिस्पेंसरी मासिक अंशदान पर सेवा देने वाला संस्थान है उसे सिर्फ और सिर्फ वही दवाई लिखना चाहिए जो विशिष्ट अस्पताल के डाक्टर ने लिखा है, उसे ऐसा नहीं कहा जा सकता कि आपने अपना प्रेस्क्रिप्शन डिस्पेंसरी में उपलब्ध दवाई के आधार पर क्यों नहीं लिखा।
बीमा वर्कर का कहना है कि जब एक बार विशिष्ट अस्पताल में उपचार के लिए रेफरल स्लिप बन गया तो —
1. या तो उस विशिष्ट अस्पताल के प्रेस्क्रिप्शन के मुताबिक उधर ही बाजार से दवाई लेकर मरीज को खाना चाहिए और सिर्फ फिर चिकित्सा प्रतिपूर्ति बिल एवं फॉर्म उस विशिष्ट डॉक्टर से साइन मुहर कराकर डिस्पेंसरी में जमा कर दिया जाना चाहिए। या
2. ई एस आई डिस्पेंसरी ही उस विशिष्ट अस्पताल के प्रेस्क्रिप्शन को दुबारा लिखे और उपलब्ध दवाई देकर अनुपलब्ध दवाई बाजार से खरीदकर उपयोग करने दे और चिकित्सा प्रतिपूर्ति बिल डिस्पेंसरी के प्रेस्क्रिप्शन के साथ स्वीकार किया जाए, दुबारा से विशिष्ट अस्पताल में साइन मुहर के लिए ना भेजा जाए। अगर डिस्पेंसरी को विशिष्ट अस्पताल का ही साइन मुहर चाहिए़ तो उपरोक्त पहला प्रोसेस को स्वीकार किया जाए।
बीमा वर्कर की ये भी शिकायत है कि, ई एस आई डिस्पेंसरी की स्थापना एवं उसमें सभी मेडिकल एवं पैरामेडिकल स्टॉफ की नियुक्ति बीमा वर्कर को सुलभता के साथ सेवा देने के लिए बिठाया गया है ना कि उसके साथ धक्काशाही या दादागिरी करने के लिए।
बीमा वर्कर संजय कुमार मिश्रा बताते हैं कि आजकल काफी सेवाएं ऑनलाइन हो गई है जैसे कि रोग अवकाश का भुगतान ई एस आई पोर्टल से ऑनलाइन कर दिया गया है लेकिन चिकित्सा प्रतिपूर्ति बिल अभितक ऑनलाइन नहीं किया गया है, इस कारण भी बीमा वर्कर को चिकित्सा प्रतिपूर्ति के लिए चक्कर काटने पड़ते हैं।
मिस्टर मिश्रा ने अपने उपरोक्त शिकायत में उपरोक्त शिकायत के समाधान के साथ ही चिकित्सा प्रतिपूर्ति बिल को भी ऑनलाइन करने का निवेदन किया है।

उम्मीद है कि संबंधित उच्चाधिकारी इस शिकायत पर संज्ञान लेकर बीमा वर्कर को हो रही समस्याओं का उचित एवम् त्वरित समाधान करेंगे।

 
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